चीन की पैन से भारत को गेन ?
चीन ने अपनी मुद्रा ”युवान” का अवमूल्यन करके पूरी दुनिया को मंदी की कगार पर खडा कर दिया है। 10 अगस्त को 20 साल बाद युवान का पहली बार अवमूल्यन किया गया और तीन दिन तक चीन अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता रहा। अब चीनी मुद्रा अवमूल्यन के परिणाम आने लग पडे हैं। चीन के आयात में करीब 14.3 फीसदी की गिरावट आई है। निर्यात में 6.1 फीसदी कम हुआ है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और सबसे बडा आयातक और निर्यातक भी। चीन को सस्ते निर्यात की तुलना में महंगा आयात में ज्यादा फायदा नजर नहीं आ रहा था । तेल की कीमतों के कारण आयात तो सस्ता हो गया मगर निर्यात अभी भी महंगा था। इसीलिए, चीन ने वस्तुओं (कमोडिटीज) की अंतरराश्ट्रीय कीमतों में गिरावट के दृष्टिगत अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करके भुगतान संतुलन में सामजस्य बैठाया। नतीजतन, लगभग एक माह में उसका ट्रेड सरप्लस 40 फीसदी बढा है। चीन यही चाहता था। बहरहाल, चीन में आर्थिक शिथिलता (स्लोडाउन) बने रहने से पूरी दुनिया को इसका खामियाजा भुगतना पड सकता है। चीन का आयात घटने से निर्यातकों देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है। कनाडा और आस्ट्रेलिया मैं इसके संकेत मिलने भी शुरु हो गए हैं। ब्राजील और रुस जैसे निर्यातक देशों को भी चीनी आयात गिरने से नुकसान हो सकता है। और-तो-और चीन की मंदी ने जापान को भी खासा प्रभावित किया है। जापानी शेयर बाजार सूचकांक “निक्की“ सात माह के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। निक्की में दर्ज गिरावट ने इस साल अब तक की सारी बढत पर पानी फेर दिया है। निक्की मंगलवार को इस साल के न्यूनतम स्तर पर बंद हुआ। आस्ट्रेलियाई और उत्तरी कोरिया के शेयर बाजार में भी मंदंडियों का दबदबा है। भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का दौर जारी है हालांकि मंगलवार को सेंसेक्स में कुछ सुधार हुआ। अब तक सेंसेक्स में 17.1 फीसदी की गिरावट आ चुकी है और यह पिछले साल (2014) मई के स्तर से मात्र डेढ फीसदी दूर है। इस समय पूरी दुनिया में आर्थिक शिथिलता व्याप्त है। मंगलवार को ओईसीडी (आर्गेनाइजेशन फॉर इक्नामिक डेवलपमेंट) द्वारा जारी रिपोर्ट मेें कहा गया है कि अमेरिका, चीन और ब्रिटेन समेत दुनिया की बडी अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ में गिरावट के आसार हैं। ओईसीडी ने ब्राजील, रुस और कनाडा में भी ग्रोथ कम होने की आशंका जताई है। ओईसीडी का यह आकलन जुलाई माह के आंकडों पर आधारित है। मगर ओईसीडी ने भारत को स्लोडाउन के प्रभाव से बाहर रखा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी यही उम्मीद जताई है। पिछले सप्ताह अंकारा में संपन्न जी-20 की बैठक में आईएमएफ ने भारत को “ अंधकार में उम्मीद की किरण“ बताया था। अर्थशास्त्रियों को भी उम्मीद है कि चीन की आर्थिक शिथिलता का भारत को फायदा हो सकता है। इससे पहले आईएमएफ कह चुका है कि 2017 में भारत ग्रोथ के मामले में चीन से आगे निकल जाएगा। तथापि, भारत के लिए मंदी के माहौल में ग्रोथ की रफ्तार को तेज करना इतना आसान नहीं है। भारत में निवेश की राह में अभी भी कई अवरोधक हैं। कॉरपोरेट जगत की उम्मौद के मुताबिक भूमि अधिग्रहण का रास्ता प्रशस्त नहीं हो पाया है। कर्ज काफी महंगा है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार अभी भी धीमी है। उधोग और व्यापार के लिए अहम गुडस एंड सर्विस टैक्स से संबंधित बिल अभी तक संसद में ही अटका है। मंगलवार को देश के अग्रणी औद्योगिक घरानों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मुलाकात करके प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा कि चीन की मंदी से भारत किस तरह लाभान्वित हो सकता है? सभी का यही सुझाव था कि इसके लिए सरकार को कर्ज सस्ता करना पडेगा और उत्पादन पर लगाए जा रहे अनावश्यक शुल्कों को घटाना पडेगा। भारत में इस्पात समेत चीन के उत्पाद काफी सस्ते हैं क्योंकि चीन में लागत काफी कम है। सस्ते भारतीय उत्पाद ही चीन के उत्पादों को डंप कर सकते हैं। मुद्रा स्फीति में लगातार गिरावट आने के बावजूद भारत में ऋण अभी भी अपेक्षाकृत मंहगा है। क्या मोदी सरकार कर्ज को सस्ता और शु ल्कों को कम कर पाएगी?
चीन ने अपनी मुद्रा ”युवान” का अवमूल्यन करके पूरी दुनिया को मंदी की कगार पर खडा कर दिया है। 10 अगस्त को 20 साल बाद युवान का पहली बार अवमूल्यन किया गया और तीन दिन तक चीन अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता रहा। अब चीनी मुद्रा अवमूल्यन के परिणाम आने लग पडे हैं। चीन के आयात में करीब 14.3 फीसदी की गिरावट आई है। निर्यात में 6.1 फीसदी कम हुआ है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और सबसे बडा आयातक और निर्यातक भी। चीन को सस्ते निर्यात की तुलना में महंगा आयात में ज्यादा फायदा नजर नहीं आ रहा था । तेल की कीमतों के कारण आयात तो सस्ता हो गया मगर निर्यात अभी भी महंगा था। इसीलिए, चीन ने वस्तुओं (कमोडिटीज) की अंतरराश्ट्रीय कीमतों में गिरावट के दृष्टिगत अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करके भुगतान संतुलन में सामजस्य बैठाया। नतीजतन, लगभग एक माह में उसका ट्रेड सरप्लस 40 फीसदी बढा है। चीन यही चाहता था। बहरहाल, चीन में आर्थिक शिथिलता (स्लोडाउन) बने रहने से पूरी दुनिया को इसका खामियाजा भुगतना पड सकता है। चीन का आयात घटने से निर्यातकों देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है। कनाडा और आस्ट्रेलिया मैं इसके संकेत मिलने भी शुरु हो गए हैं। ब्राजील और रुस जैसे निर्यातक देशों को भी चीनी आयात गिरने से नुकसान हो सकता है। और-तो-और चीन की मंदी ने जापान को भी खासा प्रभावित किया है। जापानी शेयर बाजार सूचकांक “निक्की“ सात माह के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। निक्की में दर्ज गिरावट ने इस साल अब तक की सारी बढत पर पानी फेर दिया है। निक्की मंगलवार को इस साल के न्यूनतम स्तर पर बंद हुआ। आस्ट्रेलियाई और उत्तरी कोरिया के शेयर बाजार में भी मंदंडियों का दबदबा है। भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का दौर जारी है हालांकि मंगलवार को सेंसेक्स में कुछ सुधार हुआ। अब तक सेंसेक्स में 17.1 फीसदी की गिरावट आ चुकी है और यह पिछले साल (2014) मई के स्तर से मात्र डेढ फीसदी दूर है। इस समय पूरी दुनिया में आर्थिक शिथिलता व्याप्त है। मंगलवार को ओईसीडी (आर्गेनाइजेशन फॉर इक्नामिक डेवलपमेंट) द्वारा जारी रिपोर्ट मेें कहा गया है कि अमेरिका, चीन और ब्रिटेन समेत दुनिया की बडी अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ में गिरावट के आसार हैं। ओईसीडी ने ब्राजील, रुस और कनाडा में भी ग्रोथ कम होने की आशंका जताई है। ओईसीडी का यह आकलन जुलाई माह के आंकडों पर आधारित है। मगर ओईसीडी ने भारत को स्लोडाउन के प्रभाव से बाहर रखा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी यही उम्मीद जताई है। पिछले सप्ताह अंकारा में संपन्न जी-20 की बैठक में आईएमएफ ने भारत को “ अंधकार में उम्मीद की किरण“ बताया था। अर्थशास्त्रियों को भी उम्मीद है कि चीन की आर्थिक शिथिलता का भारत को फायदा हो सकता है। इससे पहले आईएमएफ कह चुका है कि 2017 में भारत ग्रोथ के मामले में चीन से आगे निकल जाएगा। तथापि, भारत के लिए मंदी के माहौल में ग्रोथ की रफ्तार को तेज करना इतना आसान नहीं है। भारत में निवेश की राह में अभी भी कई अवरोधक हैं। कॉरपोरेट जगत की उम्मौद के मुताबिक भूमि अधिग्रहण का रास्ता प्रशस्त नहीं हो पाया है। कर्ज काफी महंगा है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार अभी भी धीमी है। उधोग और व्यापार के लिए अहम गुडस एंड सर्विस टैक्स से संबंधित बिल अभी तक संसद में ही अटका है। मंगलवार को देश के अग्रणी औद्योगिक घरानों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मुलाकात करके प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा कि चीन की मंदी से भारत किस तरह लाभान्वित हो सकता है? सभी का यही सुझाव था कि इसके लिए सरकार को कर्ज सस्ता करना पडेगा और उत्पादन पर लगाए जा रहे अनावश्यक शुल्कों को घटाना पडेगा। भारत में इस्पात समेत चीन के उत्पाद काफी सस्ते हैं क्योंकि चीन में लागत काफी कम है। सस्ते भारतीय उत्पाद ही चीन के उत्पादों को डंप कर सकते हैं। मुद्रा स्फीति में लगातार गिरावट आने के बावजूद भारत में ऋण अभी भी अपेक्षाकृत मंहगा है। क्या मोदी सरकार कर्ज को सस्ता और शु ल्कों को कम कर पाएगी?






