गुरुवार, 10 सितंबर 2015

Congress Yet Not Ready For Old to Young Leadership Transition

              राहुल की ताजपोशी ?

अपने इतिहास के भीषणतम संकट से जूझ रही कांग्रेस पार्टी “युवराज“ राहुल गांधी की ताजपोशी  को लेकर अभी भी असमंजमस में है। मंगलवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के सांगठनिक चुनावों को एक साल के लिए टाल दिया गया और मौजूदा कांग्रेसाध्यक्ष  श्रीमति सोनिया गांधी का कार्यकाल एक साल के लिए बढा दिया गया। कार्यसमिति की  बैठक में यह संकेत भी दिए गए कि राहुल गांधी को निकट भविष्य  में कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की कोई संभावना नहीं है। पार्टी को इस साल के अंत तक सांगठनिक चुनाव का काम पूरा करना है मगर ताजा स्थिति में यह मुमकिन नहीं लगता  है। चुनाव अगले साल के अंत तक संपन्न कराए जाएंगें। इस स्थिति में कांग्रेस को अपने विधान में भी संशोधन करना पडेगा। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने के लिए जल्द से जल्द  सांगठनिक चुनाव  का खाका  राहुल गांधी ने ही तैयार किया था। कांग्रेस के  सांगठनिक  ढांचे को मजबूत करने के लिए राहुल गांधी चाहते हैं कि पार्टी पदाधिकारियों को  ऊपर से थोपने की बजाय कार्यकर्ताओं द्वारा चुना जाए। पहले यही परंपरा थी मगर कांग्रेस में नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार के वर्चस्व स्थापित होने के बाद से यह परंपरा करीब-करीब खत्म हो गई। कांग्रेसियों को भी याद नहीं कि कांग्रेसाध्यक्ष के आखिरी चुनाव कब हुए। 17 साल से सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं।  लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में जुलाई, 2014 में बडे जोश -खरोश  से बूथ स्तर से लेकर राश्ट्रीय अध्यक्ष तक के चुनाव  जुलाई 2015 तक पूरा करने का ऐलान किया था। फिर इसे अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर  तक टाल दिया गया। और  अब अगले साल के अंत तक। चुनाव सारिणी की घोषणा करते समय पार्टी के चुनाव प्रभारी जनार्दन द्धिवेदी ने दावा किया था, “ पार्टी जब पॉवर में होती है, वह  सांगठनिक चुनाव  पर ज्यादा ध्यान नहीं देती। अब हमें मौका मिला है कि हम पार्टी के चुनाव कराकर इसे मजबूत करे“। इसी तरह के उदगार पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी व्यक्त किए थे। मगर यह सब बातें अब “डींगे हांकनी“ समान लग रही हैं। दरअसल, कांग्रेस में निश्चित  समय पर चुनाव कराने की परंपरा  ही नहीं है। सालों से यही हो रहा है। कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं को आशंका है कि जिस तरह भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल कृश्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी  सरीखे वयोवृद्ध नेताओं को दरकिनार कर दिया है, राहुल गांधी भी वैसा ही कर सकते हैं। राहुल गांधी पहले ही कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे मे युवाओं को ज्यादा तरजीह देकर अपनी प्राथमिकता जता चुके हैं। पार्टी की मौजूदा हालात भी लोकसभा चुनाव  पूर्व भाजपा जैसी है। कांग्रेस भी केद्र में सतारूढ होने तक पार्टी के वयोवृ्द्ध नेताओं को नाराज करने का खतरा नहीं उठा सकती। पार्टी के वयोवृद्ध नेता सोनिया गांधी को राश्ट्रीय अध्यक्ष जारी रखने के पक्ष में है। वैसे भी  कांग्रेस  धीरे-धीरे राहुल गांधी के एजेंडे पर ही काम कर रही है। पार्टी में युवाओं, महिलाओं, दलितों एवं पिछडे और आदिवासियों को आगे लाया जा रहा है। कांग्रेस के जनाधार को फिर से व्यापक और आम आदमी उन्मुख बनाना राहुल गांधी की पहली प्राथमिकता है। एक जमाने में दलित, पिछडे और आदिवासी कांग्रेस का मजबूत जनाधार था मगर भाजपा ने इसमें सेंध लगाकर, इसे ध्वस्त कर डाला। राहुल गांधी फिर से इसे खडा करने में जुटे हैं। कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी ने राहुल की इस बात के लिए तारीफ भी की। सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष   करना और कठोर  रुख अपनाना भी राहुल गांधी की ही लाइन है। कांग्रेस के हर छोटे-बडे फैसले में स्पश्टतय राहुल गांधी की ही छाप है। सांगठनिक चुनाव टाल कर कांग्रेस राहुल गांधी को थोडा और समय देना चाहती है। कांग्रेस राहुल गांधी को ठीक उसी तरह से तैयार कर रही है, जिस तरह भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को कलटिवेट किया था । नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार पर आश्रित  कांग्रेस  नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ प्रदत नेतृत्व का किस कद्र मुकाबला कर पाती, इसका जवाब जनता ही देगी। अततः लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है।