मंगलवार, 8 सितंबर 2015

Thank God, Modi Govt Fulfills a Promise

                                         मोदी सरकार ने  निभाया वायदा


मोदी सरकार ने अततः सैनिकों की “ वन रैंक, वन पेंशन“ की मांग मान ली है। लंबे समय से सैनिक इस पेंशन स्कीम को  लागू करने की मांग कर रहे थे। 1973 तक सैनिकों को  पेंशन उनके रैंक और सेवा अवधि (लैंथ ऑफ सर्विस) के अनुसार ही मिला करती थी। यानी एक ही रैंक में रिटायर होने वाले बराबर की सेवा अवधि के सैनिकों को एक समान पेंशन मिलती थी। 1973 में तत्कालीन सरकार ने तीसरे वेतन आयोग की सिफारिषों के बाद “वन रैंक, वन पेंशन“ को बंद कर दिया था। “वन रैंक, वन  पेंशन“ समाप्त होने पर  एक ही रैंक में रिटायर होने वाले बराबर की सेवा अवधि के सैनिकों को अलग-अलग पेंशन दी जा रही थी क्योंकि पेंशननिर्धारण के लिए रिटायर होने की तारीख को आधार माना जाता है। “वन रैंक, वन पेंशन “ में 
रिटायर होने की तारीख को आधार नहीं माना जाता। सैनिक हर साल पेंशन को रिवाइज करने और 15 साल पूरा होने पर रिटायर होने वाले सैंनिकों को भी “वन रैंक, वन पेंशन“ स्कीम के तहत लाने की मांग कर रहे हैं। रविवार को प्रधानमंत्री ने 15 साल पूरा करने पर रिटायर होने वाले सैनिकों को भी “वन रैंक, वन पेंशन“ का लाभ देने की मांग मान ली। पेंशन को हर साल बढाना मुमकिन नहीं है, इसलिए सरकार ने यह मांग नहीं मानी पर हर पांच साल बाद इस पर गौर करने का आष्वासन दिया है। “वन रैंक, वन पेंशन“ को लागू करने से सरकार को हर साल करीब 10,000 करोड रु का अतिरिक्त व्यय वहन करना पडेगा। केन्द्र सरकार को सैनिकों समेत रक्षा मंत्रालय के कर्मचरियों की पेंशन पर ही हर साल 55,000 करोड रु का खर्चा  करना पडता है। इनमें सैनिकों के अलावा रक्षा मंत्रालय के अन्य कर्मचारियों की पेंशन भी शामिल है मगर “वन रैंक, वन पेंशन“ का फायदा केवल सैनिकों को ही मिलेगा। निसंदेह, सैनिकों से पेंशन के मामले में घोर अन्याय होता रहा है। आजादी के बाद से गैर-सैनिकों की पेंशन बढती गई और सैनिकों की पेंशन कम होती गई। दरअसल, अधिकतर सैनिक केन्द्रीय कर्मचारियों की तुलना में काफी पहले रिटायर हो जाते हैं। सैनिक की औसत  35 से 40 की उमर में रिटायर हो जाते हैं। केवल 10 फीसदी सैनिक ही जूनियर कमिशन्ड ऑफिसर (जेसीओ) बन पाते हैं। जेसीओ और एनसीओ (नॉन-कमिशन्ड ऑफिसर) 40 से 45 और अधिकारी 50 से 55 की उमर में रिटायर हो जाते हैं। बहुत कम अधिकारी 60 साल में रिटायर होने वाले लें जनरल/ वाइस मार्शल  अथवा वाइस एडमिरल के रैंक तक पहुंच पाते हैं।  33 वर्ष  का  सेवाकाल पूरा करने पर ही पूरी  कमिशन्ड की पात्रता बनती है और मगर 85 फीसदी सैनिक 33 साल की सेवा पूरा करने से पहले ही जबरी रिटायर कर दिए जाते हैं। सैनिकों को 12 साल का सर्विस लाभ दिए जाने के बावजूद अधिकतर सैनिक 50 फीसदी की जगह 37 फीसदी कमिशन्ड पाने के पात्र बन पाते हैं। इन हालात को ध्यान में रखकर पचास के दशक तक सैनिकों को अपने आखिरी वेतन का 70 फीसदी बतौर पेंशन  मिला करती थी जबकि गैर-सैन्य कर्मचारियों (सिविलियन) को 30 फीसदी। सरकार ने सैनिकों की पेंशन  70 से 50 फीसदी कर दी और सिविलियन की 30 से 50 फीसदी। पांचवे वेतन आयोग ने सैनिकों  के लिए और ज्यादा पद सृजित करने की सिफारिश  की थी मगर उस पर आज तक अमल नहीं किया गया। सैनिकों को इस बात का गिला है कि “बाबुओं“ को केवल अपना फायदा नजर आता है। सैनिकों को दुर्गम परिस्थितियों में काम करना पडता है और सिविलियन की तुलना में सैनिक रिटायर भी जल्दी हो जाते हैं।  सैनिकों को  सिविल सर्विसिस में नौकरी देकर सरकार पूर्व  सैनिकों के पेंशन का बोझ कुछ कम कर सकती है। अमेरिका, चीन में सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद सिविल नौकरी पर रखा जाता है। भारत में ऐसी परंपरा नहीं है। बहरहाल मोदी सरकार ने देर से सही मगर एक वायदा तो निभाया है। यह बात दीगर है कि इसके लिए पूर्व सैनिकों को तीन माह का लंबा संघर्ष  करना पडा है।