न्यूक्लियर युद्ध का खतरा?
सोवियत यूनियन के बिखरते ही दुनिया को लगता था कि दो महाशक्तियों के बीच न्यूक्लियर युद्ध का खतरा टल गया है। सोवियत यूनियन के टूटते ही अमेरिका का मुकाबला करने वाला समूह बिखर गया था। दुनिया द्धिधुव्रीय (बाईपोलर) की जगह एकलधुव्रीय (यूनिपोलर) हो गई थी और “शीत युद्ध (कोल्ड वार)“ का शोर-शराब ही खत्म हो गया था। दुनिया के कुल परमाणु जखीरा का 93 फीसदी अमेरिका और रुस के पास है। दोनों के पास 7000 से 8000 परमाणु हथियार बताए जाते हैं। 2011 में अमेरिका और रुस के बीच “स्ट्रेटेजिक आर्मस रिडक्शन ट्रिटी“ के बाद से दोनों देशों ने परमाणु हथियारो को नष्ट करना कर दिया है मगर दुनिया में अभी भी 16000 के करीब घातक परमाणु हथियार हैं और इन मेंसे 4000 ऑपरेशनल हैं। रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि मौजूदा स्थिति में अमेरिका और रुस एक-दूसरे के खिलाफ परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि सामरिक रणनीति इसकी अनुमति नहीं देती। तथापि, इसका यह कतई मतलब नहीं है कि दुनिया पर से परमाणु वार का खतरा टल गया है। चीन, भारत और पाकिस्तान में आज भी परमाणु हथियार बनाने की होड लगी है। और अब ईरान को भी परमाणु हथियार बनाने की अनुमति मिल गई है। भारत, चीन, पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया परमाणु प्रसार संधि से भी बाध्य नहीं है क्योंकि चारों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। जाहिर है परमाणु हथियारों को ग्रहण करने की इस होड ने दुनिया को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है। कल्पना कीजिए अगर इस्लामिक स्टेट (आईएस) के हाथ परमाणु हथियार लग जाते हैं तो महाप्रलय कोई नहीं रोक पाएगा। सबसे ज्यादा खतरा भारतीय उपमहाद्धीप को है। अमेरिका के दो जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों- टॉम डाल्टन एवं मेशेल क्रेपेन का का ताजा आकलन है कि पाकिस्तान जिस गति से परमाणु हथियार खरीद रहा है, अगले दस सालों में उसके पास 350 से भी ज्यादा परमाणु हथियार हो सकते हैं। इस स्थिति में पाकिस्तान फ्रांस, ब्रिटेन और चीन से भी आगे निकल जाएगा। पाकिस्तान के पास अभी भी भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। बुलेटिन ऑफ एटोमिक साइंस्टिस्ट“ के अनुसार पाकिस्तान के पास इस समय 120 परमाणु हथियार है, जोकि भारत से 10 ज्यादा है। भारत के लिए यह स्थिति चिंतनीय है मगर कहते हैं पानी में 20 मीटर डूबा जाए या 200 मीटर, अगर तैरना आता है तो डूबने से बचा जा सकता है। यही बात परमाणु हथियारों के मामले में भी कही जा सकती है। हथियारों की संख्या कितनी है,यह अहम नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि परमाणु आक्रमण से बचा कैसे जाए? भारत के परमाणु हथियार जखीरे में अभी भी न तो इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) है और न ही सबमेरिन लांचड बैलेस्टिक मिसाइल (एससीबीएम)। भारत ने हाल ही में 5000 किलोमीटर मार की इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल अग्नि-पांच का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है मगर इसे पूरी तरह बनाने में अभी तीन साल लग सकते हैं। चीन के पास लंबी दूरी की 11200 किलोमीटर मारक क्षमता वाली डीएफ-31ए और 7400 किमी मारक क्षमता वाली जेएल-2 एसएलबीएम है। यह दोनों भारत के किसी भी शहर को निशाना बना सकती है। भारत ने पहले आक्रमण न करने ( नो फर्स्ट यूज न्यूक्लियर पॉलिसी) की नीति अपना रखी है। इसका मतलब है कि भारत अपने परमाणु हथियारों को अपनी रक्षा के लिए इस्तेमाल करेगा। इस स्थिति के दृष्टिगत भारत के पास सबनेरिन बेलेस्टिक मिसाइलें होनी चाहिए जो समुद्र में लंबे समय तक तैनात रहे। अपनी रक्षा के लिए भारत के पास इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल का होना भी अतिआवश्यक है। सुकून की बात यह है कि चीन और दक्षिण कोरिया की भरपूर मदद के बावजूद पाकिस्तान के पास भी अभी न तो आईसीबीएम है और न ही एससीबीएम। पर युद्ध की स्थिति में चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है। दो पडोसी देशों के पास परमाणु हथियार का होना भारत के लिए कतई शुभ नहीं है।
सोवियत यूनियन के बिखरते ही दुनिया को लगता था कि दो महाशक्तियों के बीच न्यूक्लियर युद्ध का खतरा टल गया है। सोवियत यूनियन के टूटते ही अमेरिका का मुकाबला करने वाला समूह बिखर गया था। दुनिया द्धिधुव्रीय (बाईपोलर) की जगह एकलधुव्रीय (यूनिपोलर) हो गई थी और “शीत युद्ध (कोल्ड वार)“ का शोर-शराब ही खत्म हो गया था। दुनिया के कुल परमाणु जखीरा का 93 फीसदी अमेरिका और रुस के पास है। दोनों के पास 7000 से 8000 परमाणु हथियार बताए जाते हैं। 2011 में अमेरिका और रुस के बीच “स्ट्रेटेजिक आर्मस रिडक्शन ट्रिटी“ के बाद से दोनों देशों ने परमाणु हथियारो को नष्ट करना कर दिया है मगर दुनिया में अभी भी 16000 के करीब घातक परमाणु हथियार हैं और इन मेंसे 4000 ऑपरेशनल हैं। रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि मौजूदा स्थिति में अमेरिका और रुस एक-दूसरे के खिलाफ परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि सामरिक रणनीति इसकी अनुमति नहीं देती। तथापि, इसका यह कतई मतलब नहीं है कि दुनिया पर से परमाणु वार का खतरा टल गया है। चीन, भारत और पाकिस्तान में आज भी परमाणु हथियार बनाने की होड लगी है। और अब ईरान को भी परमाणु हथियार बनाने की अनुमति मिल गई है। भारत, चीन, पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया परमाणु प्रसार संधि से भी बाध्य नहीं है क्योंकि चारों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। जाहिर है परमाणु हथियारों को ग्रहण करने की इस होड ने दुनिया को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है। कल्पना कीजिए अगर इस्लामिक स्टेट (आईएस) के हाथ परमाणु हथियार लग जाते हैं तो महाप्रलय कोई नहीं रोक पाएगा। सबसे ज्यादा खतरा भारतीय उपमहाद्धीप को है। अमेरिका के दो जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों- टॉम डाल्टन एवं मेशेल क्रेपेन का का ताजा आकलन है कि पाकिस्तान जिस गति से परमाणु हथियार खरीद रहा है, अगले दस सालों में उसके पास 350 से भी ज्यादा परमाणु हथियार हो सकते हैं। इस स्थिति में पाकिस्तान फ्रांस, ब्रिटेन और चीन से भी आगे निकल जाएगा। पाकिस्तान के पास अभी भी भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। बुलेटिन ऑफ एटोमिक साइंस्टिस्ट“ के अनुसार पाकिस्तान के पास इस समय 120 परमाणु हथियार है, जोकि भारत से 10 ज्यादा है। भारत के लिए यह स्थिति चिंतनीय है मगर कहते हैं पानी में 20 मीटर डूबा जाए या 200 मीटर, अगर तैरना आता है तो डूबने से बचा जा सकता है। यही बात परमाणु हथियारों के मामले में भी कही जा सकती है। हथियारों की संख्या कितनी है,यह अहम नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि परमाणु आक्रमण से बचा कैसे जाए? भारत के परमाणु हथियार जखीरे में अभी भी न तो इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) है और न ही सबमेरिन लांचड बैलेस्टिक मिसाइल (एससीबीएम)। भारत ने हाल ही में 5000 किलोमीटर मार की इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल अग्नि-पांच का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है मगर इसे पूरी तरह बनाने में अभी तीन साल लग सकते हैं। चीन के पास लंबी दूरी की 11200 किलोमीटर मारक क्षमता वाली डीएफ-31ए और 7400 किमी मारक क्षमता वाली जेएल-2 एसएलबीएम है। यह दोनों भारत के किसी भी शहर को निशाना बना सकती है। भारत ने पहले आक्रमण न करने ( नो फर्स्ट यूज न्यूक्लियर पॉलिसी) की नीति अपना रखी है। इसका मतलब है कि भारत अपने परमाणु हथियारों को अपनी रक्षा के लिए इस्तेमाल करेगा। इस स्थिति के दृष्टिगत भारत के पास सबनेरिन बेलेस्टिक मिसाइलें होनी चाहिए जो समुद्र में लंबे समय तक तैनात रहे। अपनी रक्षा के लिए भारत के पास इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल का होना भी अतिआवश्यक है। सुकून की बात यह है कि चीन और दक्षिण कोरिया की भरपूर मदद के बावजूद पाकिस्तान के पास भी अभी न तो आईसीबीएम है और न ही एससीबीएम। पर युद्ध की स्थिति में चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है। दो पडोसी देशों के पास परमाणु हथियार का होना भारत के लिए कतई शुभ नहीं है।






