शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

The Reservation Fire in Gujarat

                           गुजरात में आरक्षण की आग

  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गृह राज्य गुजरात तीन दिन से आरक्षण की आग में झुलस रहा है।  राज्य का ताकतवर  पटेल समुदाय सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहा है। इस मांग के समर्थन में  पटेल समुदाय के लगभग 5 लाख लोगों ने 25 अगस्त को अहमदाबाद में रैली की और इस दौरान उनकी स्थानीय लोगों से झडप हो गई। इस पर पुलिस ने लाठियां बरसाई और इससे हिंसा भडक गई। उपद्रवियों ने बडे पैमाने पर हिंसा फैलाई। बसों को आग लगा दी, रेल पटरियां उखाड दीं। सियासी नेताओं के आवास और सरकारी कार्यालयों में जमकर तोडफोड की गई। यहां तक कि राज्य के गृहमंत्री के आवास को भी नहीं बख्शा  गया। अब तक 8 लोग मारे जा चुके हैं। अहमदाबाद और सूरत में कर्फूय लगा दिया गया है। स्कूल-कॉलेजिज बंद हैं और पूरे राज्य में इंटरनेट भी ठ्प्प पडा है। हिंसा पर काबू पाने के लिए सरकार को सेना बुलानी पडी है। 2002 के दंगों के बाद पहली बार राज्य में इस कद्र हिंसा फैली है। राज्य सरकार ने पटेल समुदाय को आरक्षण देने में असमर्थता जताई है। सरकार का कथन है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय की है और राज्य में पहले ही पिछडे तबकों, अनुसूचित और जनजातियों को 50 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। पटेल समुदाय सरकार की इस दलील से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण दे रहे हैं। तमिल नाडु में सरकारी नौकरियों में 69 फीसदी आरक्षण है। यह बात दीगर है कि निर्देशों  की अवहेलना के लिए तमिलनाडु सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है। गुजरात में पटेलों की आबादी 20 फीसदी है और यह समुदाय  आर्थिक रुप से  अपेक्षाकृत समृद्ध माना जाता है। तथापि, पटेलों का कहना है कि शैक्षणिक आरक्षण न मिलने के कारण समुदाय पिछड रहा है। गुजराती हमेशा  हर आंदोलन में आगे रहें  हैं । इतिहास इस बात का गवाह है। पहली बार फिरंगियों ने गुजरात में ही कदम रखा था। 1608 में विलियम हाकिन्स ने सूरत में अपना समुद्री जहाज लाकर भारत में प्रवेश  किया था। ग्याहरवीं  शताब्दी में लूट-मार करने वाले जालिम मोहम्मद गजवी भारत में प्रमुख रुप से भव्य सोमनाथ मंदिर को लूटने के इरादे से ही आया था। दक्षिण अफ्रीका से लौटकर महात्मा गांधी ने गुजरात के साबरमती से ही भारतीय जनमानस को सजग करके का आंदोलन शुरु किया था। लौह पुरुष  सरदार पटेल की आरंभिक राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा भी गुजरात में हुई थी। मोहम्मद अली जिन्हा भी गुजरात से ही थे। क्रान्तिकारी दादाभाई नौरोजी, बद्दरुद्दीन तैब और फिरोजशांह मेहता  भी गुजराती ही थे। स्वत्रंत भारत में पहली बार 1949 में पुलिसिया कार्रवाई भी गुजरात के जूनागढ में ही हुई थी। 1974 में नवनिर्माण समिति ने भरष्टाचार के खिलाफ पहला जन आंदोलन भी गुजरात से ही शुरु किया था। इसी आंदोलन के कारण तत्कालीन चिमनभाई पटेल सरकार को पदच्युत होना पडा था। संक्षेप में गुजरात में जब कभी भी कोई आंदोलन हुआ है, इसकी परिणिति राश्ट्रीय स्तर पर बडे बदलाव में हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद इसकी मिसाल हैं। गुजरात के “सुशासन“  और विकास के मॉडल ने उन्हें राष्ट्रीय  स्तर पर लोकप्रिय बनाया था। उनकी  इसी छवि ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार स्पष्ट  बहुमत भी दिलाया। पटेल समुदाय के आंदोलन को भी इसी परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इस समुदाय की देखादेखी अन्य राज्य में भी आरक्षण की मांग उठ सकती है। हरियाणा और राजस्थान में पहले ही जाट आरक्षण की मांग कर रहे हैं। महाराष्ट्र  में धनकर समाज भी आरक्षण के लिए खडा हो गया है। गुजरात इस बार भी केन्द्र और राज्य सरकार के लिए कठिन अग्नि परीक्षा है।