शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

Uphaar Cinema Case. Not a Landmark Judgement

                  उपहार सिनेमा अग्निकांड


उपहार सिनेमा अग्निकांड के प्रमुख दोषी   अंसल बधुओं को जेल की सजा से छूट मिलना पीडित परिवारों के जले पर नमक छिडकना जैसा है। 13 जून 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा में बार्डर फिल्म दिखाई जा रही थी। इस दौरान सिनेमा घर में आग लग गई और इस  भीषण अग्निकांड में 59 लोगों की मृत्यु हो गई। अधिकतर लोग दम घुटने से मारे गए।  देश  की सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने असंल बंधुओं को उपहार सिनेमा कांड के लिए दोषी तो माना है मगर इतना भी नहीं कि इन्हें और ज्यादा जेल की सजा काटनी पडे। न्यायालय ने दोनों को 60 करोड रु के मुआवजा लेकर जेल की सजा से बरी कर दिया है। उपहार सिनेमा के मालिक 75 वर्शीय सुशील अंसल पांच महीने और गोपाल अंसल चार महीने जेल में रह चुके हैं। उच्च न्यायालय ने दोनों को एक-एक साल की सजा सुनाई थी जबकि निचली अदालत ने दो-दो साल की जेल की सजा दी  थी। इस मामले में  सर्वोच्च न्यायालय समेत सभी अदालतों ने यह तो माना है कि इस अग्निकांड के लिए  उपहार सिनेमा के मालिक दोषी हैं मगर दोषियों को कितनी सजा दी जाए, इस पर माननीय न्यायाधीश  एकमत नहीं रहे हैं। ट्रायल कोर्ट  ने अंसल बंधुओं को दो-दो साल की सजा सुनाई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसे घटाकर एक-एक साल कर दी और अब सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है जितनी जेल काट ली, वह पर्याप्त है। इससे पहले मार्च, 2014 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस टीएस ठाकुर और जस्टिस सुधा मिश्रा वाली खंडपीठ में सजा पर मतभेद होने से मामला तीन जजों की पीठ को सौंपा गया था। जस्टिस ठाकुर ने उच्च न्यायालय द्वारा सुनाई गई एक-एक साल की सजा बरकरार रखी थी। जस्टिस सुधा मिश्रा ने सुशील अंसल की सजा तो कम करके पांच महीने (जेल में काटी गई सजा ) कर दी मगर गोपाल अंसल को दो साल की सजा सुनाई थी। 18 साल तक न्याय मिलने का इंतजार कर रहे पीडित परिवारों को इस बात का गिला है कि 59 निर्दोष  लोगों की जान लेने वाले अंसल बंधुओं को माकूल सजा नहीं मिल पाई है और 60 करोड का मुआवजा देकर दोषी  जेल की सजा से छूट गए हैं।  सिनेमा में आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं थे और नही आपात स्थिति में बाहर सुरक्षित निकलने के इंतजामात थे। नियमानुसार, सिनेमा के प्रबंधकों को इस तरह के पुख्ता इंतजाम करने पडते हैं। इस स्थिति में 59 लोंगों की दर्दनाक मौत के दोषी अंसल बधुओं को पांच माह की जेल  पीडितों के जख्मों को और हरा कर रही है। उपहार अग्निकांड में दो-दो बेटे खो चुकी  पीडितों के संगठन की अध्यक्ष नीलम कृश्णमूर्ति की पीडा स्वभाविक है। इस फैसले से उनका न्यायपालिका पर से विष्वास उठ गया है। इस पीडित मां की इस राय से जनमानस सहमत है कि देष में अमीर और गरीब के लिए कानून एक जैसा नहीं है। भारत का कानून साधन सपन्न वर्ग उन्मुख है। यहां सबको एक जैसा अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) नहीं मिलता है। अमीर बडे से बडा वकील करके आसानी से छूट जाता है क्योंकि  अदालत फैसला भावनाओं से नहीं, बल्कि  साक्ष्यों के आधार पर  सुनाती है। अमीर सब कुछ जुटा लेता है और भ्रष्ट  पुलिस (प्रोसिक्युषन) भी उसी की मदद करती है। आम आदमी  की तो वकील हायर करने की भी हैसियत ही नहीं है। और अगर जैसे-तैसे वह वकील कर भी लेता है, अदालत में लंबी तारीख पर तारीख मिलने और इस दौरान होने वाले खर्चे से उसकी कमर टूट जाती है।  उपहार अग्निकांड में शीर्ष   कोर्ट तक का फैसला आते-आते 18 साल लग गए हैं। इतनी लंबी लडाई सिर्फ अमीर लड सकता है आम आदमी तो साल-दो साल की अदालती सुनवाई का खर्चा  वहन नहीं कर सकता। जनमानस को अभी भी न्यायपलिका पर भरोसा है मगर उपहार अग्निकांड जैसे आम आदमी के इस भरोसे को तोड सकते हैं। कानूनी लडाई में सबको एक जैसे पायदान ( लेवल प्लेइंग फील्ड) मिलने चाहिए।