इस फैसले को कोटि-कोटि प्रणाम
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले से देष की षिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है, बषर्ते इसे अक्षरषः अमली जामा पहनाया जाए। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि देष के सरकारी स्कूलों के गिरते षैक्षणिक स्तर को बचाने के लिए जरुरी है कि सियासी नेताओं, सरकारी अफसरों और जजों के बच्चे भी इन्हीं स्कूलों में पढाई करें। अदालत ने उतर प्रदेष के मुख्य सचिव को निर्देष दिए हैं कि सरकारी खजाने से वेतन पाने वाले जन प्रतिनिधियों, अफसरों और जजों के बच्चों की पढाई सरकारी स्कूलों में अनिवार्य कर दी जाए। इसके लिए उच्च न्यायालय ने सरकार को छह माह का समय दिया है। न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी है कि अगर ये लोग ऐसा नहीं करते हैं, तो वे निजी स्कूलों में दी जाने वाली फीस के बराबर पैसा सरकारी खजाने में जमा कराएं। उच्च न्यायालय का कहना है कि मौजूदा तीन स्तरीय षिक्षा- अंग्रेजी कॉन्वेंट, मध्यम वर्ग के प्राइवेट और सरकारी स्कूल- के तहत सरकारी स्कूलों में पढने की अनिवार्यता न रहने से इन स्कूलों का स्तर उतरोत्तर गिरता जा रहा है। सरकारी स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक हैं और न ही सुविधाएं। न्यायालय का यह भी मानना है कि जब तक सरकारी वेतन पाने वलों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढेंगे, इनका षैक्षणिक स्तर सुधर नहीं सकता है। न्यायालय का आकलन एकदम सही है। 2014 की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेषन रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि षहर तो षहर, अब गांवों में भी सरकारी स्कूल पिछडते जा रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2010 में जहां गंावों के 71. 1 प्रतिषत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढाई करते थे, वहीं 2014 आते-आते यह एनरोलमेंट 64.9 प्रतिषत ही रह गई है। इसके विपरीत निजी स्कूलों में 2006 में 18.7 प्रतिषत बच्चों ने दाखिला लिया था, तो 2014 तक यह बढते- बढते 30. 8 प्रतिषत तक पहुंच गया था। इस रिपोर्ट से सरकार तो चेती नहीं मगर न्यायपालिका ने इसका जरुर संज्ञान लिया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस क्रांतिकारी फैसले से उत्तर प्रदेष में ही नहीं, पूरे देष में हलचल मचना स्वभाविक है। उत्तर प्रदेष की देखादेखी अन्य राज्यों में भी इस व्यवस्था की मांग उठ सकती है। वैसे अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम सियासी नेता और नौकरषाही आसानी से इस फैसले पर अमल नहीं करने देंगे। और अगर अमल किया भी जाता है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इसका अक्षरषः पालन किया जाएगा। अफसरो, नेताओं और जजों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ रहे हैं, इसकी निगरानी अदालत नहीं कर सकती। यह काम प्रषासन का है और हर बार की तरह, इस बार भी अदालती फैसले की धज्जियां उडाई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के लाल बत्ती संबंधी फैसले का ही उदाहरण लिया जाए। देष की सर्वोच्च न्यायालय ने स्पश्ट निर्देष दे रखे हैं कि लाल बत्ती (रेड बीकॉन) का बेजा इस्तेमाल न किया जाए। मगर आज भी सडकों पर ऐरा-गैरा लाल बत्ती लगाकर रौब जमाते फिरते हैं। सियासी नेताओं में तो लाल बत्ती का बेहद क्रेज है और अपना स्टेट्स प्रदर्षित करने के लिए वे इसका अक्सर दुरुपयोग करते हैं। इसी तरह वाहनों पर काली फिल्म चढाने का मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुरक्षा व्यवस्था को छोडकर कार या निजी वाहन पर ब्लैक फिल्म के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद निजी वाहनों में धडल्ले से काली फिल्म का प्रयोग किया जा रहा है। पुलिस से षुरु-षुरु में न्यायालय के आदेषों का सख्ती से पालन करने में दिलचस्पी दिखाई थी। देष में अब तक जितने भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं, उन्हें लाने में न्यायपालिका का ही हाथ है।और भी कई फैसले हैं, जिन पर सख्ती से पालन नहीं हो पाया है।ं मौजूदा फैसले का हश्र जो भी हो मगर इतना तय है कि यह देष के जनमानस को आंदोलित कर सकता है। फिरंगी राज में भी सरकारी स्कूलों की इतनी दुर्दषा नहीं थी, जितनी आज स्वराज में है। एक जमाना था जब सरकारी स्कूलों की पढाई का लोहा माना जाता था। इलाहाबाद न्यायालय के फैसले से फिर वह जमाना लौट सकता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले से देष की षिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है, बषर्ते इसे अक्षरषः अमली जामा पहनाया जाए। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि देष के सरकारी स्कूलों के गिरते षैक्षणिक स्तर को बचाने के लिए जरुरी है कि सियासी नेताओं, सरकारी अफसरों और जजों के बच्चे भी इन्हीं स्कूलों में पढाई करें। अदालत ने उतर प्रदेष के मुख्य सचिव को निर्देष दिए हैं कि सरकारी खजाने से वेतन पाने वाले जन प्रतिनिधियों, अफसरों और जजों के बच्चों की पढाई सरकारी स्कूलों में अनिवार्य कर दी जाए। इसके लिए उच्च न्यायालय ने सरकार को छह माह का समय दिया है। न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी है कि अगर ये लोग ऐसा नहीं करते हैं, तो वे निजी स्कूलों में दी जाने वाली फीस के बराबर पैसा सरकारी खजाने में जमा कराएं। उच्च न्यायालय का कहना है कि मौजूदा तीन स्तरीय षिक्षा- अंग्रेजी कॉन्वेंट, मध्यम वर्ग के प्राइवेट और सरकारी स्कूल- के तहत सरकारी स्कूलों में पढने की अनिवार्यता न रहने से इन स्कूलों का स्तर उतरोत्तर गिरता जा रहा है। सरकारी स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक हैं और न ही सुविधाएं। न्यायालय का यह भी मानना है कि जब तक सरकारी वेतन पाने वलों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढेंगे, इनका षैक्षणिक स्तर सुधर नहीं सकता है। न्यायालय का आकलन एकदम सही है। 2014 की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेषन रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि षहर तो षहर, अब गांवों में भी सरकारी स्कूल पिछडते जा रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2010 में जहां गंावों के 71. 1 प्रतिषत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढाई करते थे, वहीं 2014 आते-आते यह एनरोलमेंट 64.9 प्रतिषत ही रह गई है। इसके विपरीत निजी स्कूलों में 2006 में 18.7 प्रतिषत बच्चों ने दाखिला लिया था, तो 2014 तक यह बढते- बढते 30. 8 प्रतिषत तक पहुंच गया था। इस रिपोर्ट से सरकार तो चेती नहीं मगर न्यायपालिका ने इसका जरुर संज्ञान लिया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस क्रांतिकारी फैसले से उत्तर प्रदेष में ही नहीं, पूरे देष में हलचल मचना स्वभाविक है। उत्तर प्रदेष की देखादेखी अन्य राज्यों में भी इस व्यवस्था की मांग उठ सकती है। वैसे अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम सियासी नेता और नौकरषाही आसानी से इस फैसले पर अमल नहीं करने देंगे। और अगर अमल किया भी जाता है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इसका अक्षरषः पालन किया जाएगा। अफसरो, नेताओं और जजों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ रहे हैं, इसकी निगरानी अदालत नहीं कर सकती। यह काम प्रषासन का है और हर बार की तरह, इस बार भी अदालती फैसले की धज्जियां उडाई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के लाल बत्ती संबंधी फैसले का ही उदाहरण लिया जाए। देष की सर्वोच्च न्यायालय ने स्पश्ट निर्देष दे रखे हैं कि लाल बत्ती (रेड बीकॉन) का बेजा इस्तेमाल न किया जाए। मगर आज भी सडकों पर ऐरा-गैरा लाल बत्ती लगाकर रौब जमाते फिरते हैं। सियासी नेताओं में तो लाल बत्ती का बेहद क्रेज है और अपना स्टेट्स प्रदर्षित करने के लिए वे इसका अक्सर दुरुपयोग करते हैं। इसी तरह वाहनों पर काली फिल्म चढाने का मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुरक्षा व्यवस्था को छोडकर कार या निजी वाहन पर ब्लैक फिल्म के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद निजी वाहनों में धडल्ले से काली फिल्म का प्रयोग किया जा रहा है। पुलिस से षुरु-षुरु में न्यायालय के आदेषों का सख्ती से पालन करने में दिलचस्पी दिखाई थी। देष में अब तक जितने भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं, उन्हें लाने में न्यायपालिका का ही हाथ है।और भी कई फैसले हैं, जिन पर सख्ती से पालन नहीं हो पाया है।ं मौजूदा फैसले का हश्र जो भी हो मगर इतना तय है कि यह देष के जनमानस को आंदोलित कर सकता है। फिरंगी राज में भी सरकारी स्कूलों की इतनी दुर्दषा नहीं थी, जितनी आज स्वराज में है। एक जमाना था जब सरकारी स्कूलों की पढाई का लोहा माना जाता था। इलाहाबाद न्यायालय के फैसले से फिर वह जमाना लौट सकता है।






