वन रैंक, वन पेंषन
देष के लिए यह बात अति दुर्भाग्यपूर्ण है कि सीमाओं पर दुषमनों के छक्के छुडाने वाले वीरों को अब अपना जायज हक पाने के लिए उम्र की आखिरी पडाव में लंबा संघर्श करना पड रहा है। देष के लगभग 25 लाख पूर्व सैनिक और वीरों की विधवाएं लंबे समय से “वन रैंक, वन पेंषन पाने के लिए संघर्श कर रहे हैं। सबसे ज्यादा पूर्व सैनिक 2,71, 928 उत्तर प्रदेष के हैं और उसके बाद पंजाब और हरियाणा के। पंजाब और हरियाणा को तो सैनिकों की भूमि कहा जाता है। आंकडे इसके गवाह हैं। पंजाब में 1,91, 702 और हरियाणा में 1,65,72 पूर्व सैनिक हैं। दोनों राज्यों के पूर्व सैनिकों को मिला दें तो देष में सबसे ज्यादा पूर्व सैनिक इन्ही दो राज्यों में है। नई दिल्ली के जंतर मंतर पर अनषन करने वाले अधिकांष पूर्व सैनिक भी पंजाब-हरियाणा से हैं। संप्रग सरकार ही नहीं, मोदी सरकार भी आज तक उनकी इस मंाग को पूरा नहीं कर पाई है। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव घोशणा पत्र में “वन रैंक, वन पेंषन“ का वायदा किया था। यह वायदा आज तक निभाया नहीं गया है। देष की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों पूर्व सैनिक अनषन पर कर रहे हैं। इस अनषन के दृश्टिगत पूर्व सैनिकों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपने स्वत्रंतता दिवस के संबोधन में “वन रैंक, वन पेंषन“ का ऐलान करेगें। प्रधानमंत्री ने “वन रैंक, वन पेंषन“ को लागू करने का वायदा तो किया मगर इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की। इस बात से खफा पूर्व सैनिकों ने अब आमरण अनषन षुरु कर दिया है। पूर्वे सैनिकों ने विरोधस्वरुप सभी सरकारी समरोहों और कार्यक्रम का बॉयकॉट करने का निर्णय भी लिया है। यहां तक कि 28 अगस्त को 1965 के भारत-पाकिस्तान की 50वें साल पर आयोजित कार्यक्रम का भी पूर्व सैनिक बहिश्कार करेंगे। इस स्थिति में इस कार्यक्रम का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा। देष के 10 पूर्व सेनाध्यक्षों ने प्रधानमंत्री को चिठठी लिखकर “वन रैंक, वन पेंषन“ को अविलंब लागू करने की मांग की है। अनषन से चिंतित प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने मंगलवार को पूर्व सैनिक से वार्ता षुरु कर दी है। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेन्द्र मिश्रा ने पूर्व सैनिकों की मांग पर विषेश बैठ्क बुलाई। इससे लग रहा है कि सरकार दो-एक दिन में “वन रैंक, वन“ पेंषन की घोशणा कर सकती है। बहरहाल, इस बात पर सबसे ज्यादा आष्चर्य हो रहा है कि आखिर सरकार की ऐसी क्या विवषता है कि पूर्व सैनिकों को “वन रैंक, वन पेंषन“ देने में बेवजह विलंब किया जा रहा है? रक्षा मंत्रालय ने एक समान पेंषन देने का फार्मूला काफी पहले तैयार कर लिया था। इसे लागू करने पर सरकार को हर साल 8300 करोड रु का अतिरिक्त वित्तिीय बोझ उठाना पडेगा। केन्द्र सरकार इतनी भी कंगाल नहीं है कि वह इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को वहन न कर पाए। विलंब की असली वजह वित्तीय तंगी की बजाय सियासी स्वार्थ हैं। दरअसल, सरकार को लगता है कि “ वन रैंक, वन पेंषन” लागू करने पर पूर्व सैनिक खुष होने की बजाय सरकार से नाराज हो सकते हैं। रक्षा मंत्रालय द्वारा तय फार्मूले के हिसाब से “वन, रैंक, वन पेंषन“ के लागू होने पर जवान को न्यूनतम 525 रु और अधिकतम 1750 रु मासिक चृद्धि मिलेगी। विधवाओं की पेंषन में 1500 रु मासिक और अधिकारियों की पेंषन में 10,000 से 20,000रु की वृद्धि होगी। सरकार 2009 में छठे वेतन आयोग की सिफारिषों पर सैनिकों की पेंषन को संषोधित कर चुकी है। मोदी सरकार को आषंका है कि मौजूदा स्थिति में “वन, रैंक, वन पेंषन“ से पूर्व सैनिकों को बहुत ज्यादा लाभ नहीं होने जा रहा है और इस मामले में पूर्व सैनिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। जल्द ही सातवें वेतन आयोग की सिफारिषें आने वाली हैं और इन्हें 1 जनवरी 2016 से लागू करने के लिए सरकार वचनवद्ध है। विलंब की यही वजह है।






