चीन का “करंेसी“ दांव
अपनी करेंसी युवान का लगातार तीन दिन अवमूल्यन करके चीन ने साफ संकेत दिए हैं कि वह समाजवादी व्यवस्था से उब कर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ रहा है। मंगलवार को चीन ने युवान का 1.69 प्रतिषत, बुधवार को 1.6 प्रतिषत और वीरवार को 1 प्रतिषत का अवमूल्यन करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इससे करेंसी “वॉर“ पनप सकता है। चीन दुनिया की तेजी से बढती और अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। इस बात के दृश्टिगत चीनी मुद्रा के अवमूल्यन से अंतरराश्ट्रीय बाजार में हलचल मचना स्वभाविक है। अमूमन, बदहाल मुद्रा की स्थिति में ही अवमूल्यन (डिवैल्यूएषन) किया जाता है और अगर मुद्रा काफी मजबूत है तो पुनर्मूल्याकंन (रिवैल्युएषन) किया जाता है। चीनी अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति अभी इतनी बुरी भी नहीं थी कि युवान के अवमूल्यन की नौबत आन पडे। इतना जरुर है कि पिछले कुछ दिनों से षेयर बाजार में जारी लगातार गिरावट और अर्थव्यवस्था की अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार ने चीनी नेतृत्व को चिंतित कर रखा था। मध्य जून-जुलाई के पहले पखवाडे के दौरान चीन के मुख्य षेयर मार्केट इंडेक्स षंघाई कम्पोजिट में तीस प्रतिषत की गिरावट दर्ज हुई। चीनी सरकार द्वारा 500 अरब डॉलर की नगदी बाजार में झोंकने के बावजूद षेयर बाजार मंदी से उभर नहीं पाया। चीनी अर्थव्यवस्था की ग्रोथ दर भी सात प्रतिषत के आसपास है जबकि पहले यह 9 प्रतिषत हुआ करती थी। हाल में प्रकाषित आर्थिक आकलन में बताया गया है कि अगले दो सालों (2017 तक) में भारत ग्रोथ के मामले में चीन को पीछे छोड देगा। चीन ने निर्यात में जबरदस्त छलांग लगाई है और इस समय में वह दुनिया का अग्रणी निर्यातक देष है। 1985 में जहां चीन का दुनिया के निर्यात में मात्र 1.4 प्रतिषत का हिस्सा था, 2011 में यह बढकर 10.4 प्रतिषत तक पहुंच गया था। और पिछले कुछ सालों से चीन दुनिया का अग्रणी निर्यातक देष बना हुआ है। मगर इस बार निर्यात में पिछले साल की तुलना मेॅ आठ प्रतिषत की गिरावट आई है। चीन के लिए यह बहुत बडा झटका है। विषेशज्ञों का मानना है कि चीन ने गिरते निर्यात को बचाने और इसे बढावा देने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया है हालांकि इसका पूंजी बाजार पर बुरा असर पड सकता है। तथापि माना जा रहा है कि चीन ने एक तीर से दो निषाने साधे हैं। युवान का अवमूल्यन करके चीन ने स्वदेषी उत्पादों को डॉलर की तुलना में सस्ता किया है। इससे बाजार में चीनी उत्पाद और सस्ते हो जाएंगे। अमेरिका लगातार चीन पर यही आरोप लगाता रहा है कि वुवान को अंतरराश्ट्रीय एक्सचेंज रेट से स्वतंत्र रखकर चीन अपने निर्यात को प्रोटेक्ट करता रहा है जो कि विष्व मुक्त व्यापार के खिलाफ है। इस स्थिति में अमेरिका चीन से युवान को मार्केट एक्सचेंज रेट से तय करने की मांग कर रहा था। युवान का अवमूल्यन करके चीन का कहना है कि वह अपनी मुद्रा को अंतरराश्ट्रीय एक्सचेज रेट से जोडना चाहता है। यही चीन का दीर्घकालीन लक्ष्य भी है। चीन अंतरराश्ट्रीय मुद्रा कोश के एलीट ”ग्लोबल करेंसी क्लब” में षुमार होने के लिए बेताब है और यह तभी मुमकिन है जब चीन की मुद्रा युवान भी अन्य मुद्राओं की तरह मार्केट एक्सचेंज रेट से जुडी रहे। चीन की सबसे बडी समस्या यह है कि यह मुल्क समाजवादी षासन (कम्युनिस्ट पार्टी का राज) से पूंजीवादी व्यवस्था को हांकना चाहता है। नतीजतन, इस समय चीन न तो मात्से-तुंग के सपनों का विषुद्ध समाजवादी देष है और न ही अमेरिका की तरह खालिस पूंजीवादी। चीन का विषाल मध्यम बर्ग भोग-विलास का आदी हो चुका है। यही वर्ग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे बडा समर्थक है, यही चीन की सबसे बडी दुविधा भी। यह वर्ग पूंजीवाद चाहता है जिसमें उसे भोग-विलास मिलता है। समाजवाद में इस वर्ग ने सिर्फ कश्ट झेले हैं। दुनिया में समाजवाद का लगभग अंत तय लग रहा है।
अपनी करेंसी युवान का लगातार तीन दिन अवमूल्यन करके चीन ने साफ संकेत दिए हैं कि वह समाजवादी व्यवस्था से उब कर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ रहा है। मंगलवार को चीन ने युवान का 1.69 प्रतिषत, बुधवार को 1.6 प्रतिषत और वीरवार को 1 प्रतिषत का अवमूल्यन करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इससे करेंसी “वॉर“ पनप सकता है। चीन दुनिया की तेजी से बढती और अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। इस बात के दृश्टिगत चीनी मुद्रा के अवमूल्यन से अंतरराश्ट्रीय बाजार में हलचल मचना स्वभाविक है। अमूमन, बदहाल मुद्रा की स्थिति में ही अवमूल्यन (डिवैल्यूएषन) किया जाता है और अगर मुद्रा काफी मजबूत है तो पुनर्मूल्याकंन (रिवैल्युएषन) किया जाता है। चीनी अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति अभी इतनी बुरी भी नहीं थी कि युवान के अवमूल्यन की नौबत आन पडे। इतना जरुर है कि पिछले कुछ दिनों से षेयर बाजार में जारी लगातार गिरावट और अर्थव्यवस्था की अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार ने चीनी नेतृत्व को चिंतित कर रखा था। मध्य जून-जुलाई के पहले पखवाडे के दौरान चीन के मुख्य षेयर मार्केट इंडेक्स षंघाई कम्पोजिट में तीस प्रतिषत की गिरावट दर्ज हुई। चीनी सरकार द्वारा 500 अरब डॉलर की नगदी बाजार में झोंकने के बावजूद षेयर बाजार मंदी से उभर नहीं पाया। चीनी अर्थव्यवस्था की ग्रोथ दर भी सात प्रतिषत के आसपास है जबकि पहले यह 9 प्रतिषत हुआ करती थी। हाल में प्रकाषित आर्थिक आकलन में बताया गया है कि अगले दो सालों (2017 तक) में भारत ग्रोथ के मामले में चीन को पीछे छोड देगा। चीन ने निर्यात में जबरदस्त छलांग लगाई है और इस समय में वह दुनिया का अग्रणी निर्यातक देष है। 1985 में जहां चीन का दुनिया के निर्यात में मात्र 1.4 प्रतिषत का हिस्सा था, 2011 में यह बढकर 10.4 प्रतिषत तक पहुंच गया था। और पिछले कुछ सालों से चीन दुनिया का अग्रणी निर्यातक देष बना हुआ है। मगर इस बार निर्यात में पिछले साल की तुलना मेॅ आठ प्रतिषत की गिरावट आई है। चीन के लिए यह बहुत बडा झटका है। विषेशज्ञों का मानना है कि चीन ने गिरते निर्यात को बचाने और इसे बढावा देने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया है हालांकि इसका पूंजी बाजार पर बुरा असर पड सकता है। तथापि माना जा रहा है कि चीन ने एक तीर से दो निषाने साधे हैं। युवान का अवमूल्यन करके चीन ने स्वदेषी उत्पादों को डॉलर की तुलना में सस्ता किया है। इससे बाजार में चीनी उत्पाद और सस्ते हो जाएंगे। अमेरिका लगातार चीन पर यही आरोप लगाता रहा है कि वुवान को अंतरराश्ट्रीय एक्सचेंज रेट से स्वतंत्र रखकर चीन अपने निर्यात को प्रोटेक्ट करता रहा है जो कि विष्व मुक्त व्यापार के खिलाफ है। इस स्थिति में अमेरिका चीन से युवान को मार्केट एक्सचेंज रेट से तय करने की मांग कर रहा था। युवान का अवमूल्यन करके चीन का कहना है कि वह अपनी मुद्रा को अंतरराश्ट्रीय एक्सचेज रेट से जोडना चाहता है। यही चीन का दीर्घकालीन लक्ष्य भी है। चीन अंतरराश्ट्रीय मुद्रा कोश के एलीट ”ग्लोबल करेंसी क्लब” में षुमार होने के लिए बेताब है और यह तभी मुमकिन है जब चीन की मुद्रा युवान भी अन्य मुद्राओं की तरह मार्केट एक्सचेंज रेट से जुडी रहे। चीन की सबसे बडी समस्या यह है कि यह मुल्क समाजवादी षासन (कम्युनिस्ट पार्टी का राज) से पूंजीवादी व्यवस्था को हांकना चाहता है। नतीजतन, इस समय चीन न तो मात्से-तुंग के सपनों का विषुद्ध समाजवादी देष है और न ही अमेरिका की तरह खालिस पूंजीवादी। चीन का विषाल मध्यम बर्ग भोग-विलास का आदी हो चुका है। यही वर्ग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे बडा समर्थक है, यही चीन की सबसे बडी दुविधा भी। यह वर्ग पूंजीवाद चाहता है जिसमें उसे भोग-विलास मिलता है। समाजवाद में इस वर्ग ने सिर्फ कश्ट झेले हैं। दुनिया में समाजवाद का लगभग अंत तय लग रहा है।






