शनिवार, 15 अगस्त 2015

After 68 Years of Independence, Where Do We Stand?

                                              स्वतंत्रता के 68 वर्श


देष को स्वतंत्र हुए 68 (लगभग सात दषक) वर्श हो गए हैं। षनिवार को भारत अपना 69वां स्वत्रतता दिवस मनाएगा। सात दषक बहुत लंबा समय होता है। भारत में आदमी की औसत आयु भी इतनी नहीं है। देष ने आर्थिक तरक्की की है, इस बात में कोई संदेह नहीं है। भारत आज दुनिया की तीव्रतम उभरती अर्थव्यवस्था है। दुनिया की पांचवी बडी सैन्य षक्ति है। भारतीय सेना और रेलवे विभाग मिलकर दुनिया के दस बडे एम्पालॉयर्स  हैं। दोनों ने मिलकर करीब तीन करोड लोगों को रोजगार मुहैया करा रखा है। भ दुनिया के सबसे कम लागत वाले उपग्रह “मंगलायन“ को पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक उतार कर हमने अंतरिक्ष विज्ञान में अपना लोहा मनवाया है। भारत दुनिया की ताकतवर परमाणु षक्तियों की श्रेणी में षुमार है। दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र भी भारत ही है। गांव-गांव स्कूल हैं, स्वास्थय केन्द्र हैं, सडकें भी  हैं, बिजली और पीने का पानी भी। हर जगह मोबाइल और इंटरनेट पहुंच चुका है। लगभग सभी बुनियादी सुविधाएं हैं। इतना सब होने पर भी भारत अंतरराश्ट्रीय जगत अभी सामाजिक-आर्थिक रुप से पिछडा माना जाता है। कुछ साल  पहले भारत को “सपेरों (स्नैक चार्मर) का देष माना जाता था, अब बहषियों का देष। कारण: इंटरनेट के जमाने में भी भारत में बहू-बेटियों को दहेज के लिए जलाकर मारा जाता है। अपनी पसंद का वर चुनने पर बेटी-दामाद की तथाकथित “ऑनर“के लिए हत्या कर दी जाती है। बच्चियों तक से बहषी बलात्कार से बख्षा नहीं जाता। महिलाओं को अगवा करके उनकी अस्मत लूटी जाती है। कानूनन, अवैध घोशित किए जाने के बावजूद,बालविवाह की प्रथा बदस्तूर जारी है। महिलाओं को चूल्हे-चौके की चारदीवारी में रखा जाता है। उन्हें अपनी पसंद से कुछ भी करने की छूट नहीं है। आजादी के सात दषक बाद भी की ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाए वस्त्र-परिधान  अपनी पसंद का नहीं पहन सकती। यहां तक कि समाज के ठेकेदारों को लडकियों के जीन्स पहनने पर भी ऐतराज है। भारतीय समाज में पुरुश को खुली छूट है मगर महिलाओं को जरा सी भी आजादी नहीं। इन्हीं सब कारणों से भारतीय समाज कबायली माना जाता है। आर्थिक क्षेत्र में तरक्की कागजों पर ज्यादा नजर आती है। जमीनी सच्चाई यह है कि स्कूलों में अध्यापक नहीं हैं और अगर हैं भी तो ट्यूषन पर ज्यादा जोर दिया जाता है। बच्चों को पढाया कम, भडकाया ज्यादा जाता है। सरकारी स्कूलों के नतीजे बेहतर दिखाने के लिए छात्रों को बगैर परीक्षा के पास कर दिया जाता है। परीक्षा लिए जाने पर जमकर नकल कराई जााती है। एक जमाने में अंग्रेजी को भारत पर थोपने के लिए लार्ड  मैकॉले को दोशी ठहराया जाता था मगर आजादी के बाद सियासी नेताओं अंग्रेजी के जबरदस्त फैन बन गए और अपने बच्चों को  अग्रेंजी स्कूलों (कॉन्वेंट एजुकेष्ेन) में पढा कर “अग्रेज“ बन गए। सरकारी स्कूलों को निम्न स्तर का माना गया। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित स्वास्थय केन्द्रों में या तो डाक्टर हैं ही नहीं और अगर हैं भी तो कभी-कभार ही नजर आते हैं और ज्यादातर प्राइवेट प्रेक्टिस पर ध्यान देते हैं। सडकों का बुरा हाल है और निर्माण के दौरान ठेकेदारों द्वारा नेताओं और अफसरों को घूस दी जाती है, उसकी कमी घटिया निर्माण में पूरी कर ली जाती है। बिजली अक्सर गुल रहती है। भीशण गर्मी में तो बिजली आती ही नहीं। स्वच्छ पेयजल तो भारत में जैसे सपना हो गया है। चालीस प्रतिषत जनता को बिजली-पानी तो क्या, दो वक्त की भरपूर सूखी रोटी भी नसीब नहीं। सडकें बनाने, स्कूल और स्वास्थय केन्द्र खोलने, घर-घर नलके लगाने और बिजली पहुंचाने से आर्थिक उन्नति नहीं हो जाती। लोगों को जब तक चौबीस घंटे बिजली और पीने का षुद्ध पानी भी न मिले तो आजादी के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। अच्छी और हर तरह की प्रतियोगिता के योग्य बनाने वाली षिक्षा न मिले तो उसका कोई फायदा नहीं और अगर  भावी पीढी को ऐसी षिक्षा से महरुम रखा जाए तो  देष आगे बढ ही नहीं सकती। इसी तरह अगर बुनियादी स्वास्थय सेवाएं भी न हों, देष खुषाहल  और स्वस्थ नहीं हो सकता। सच यह है कि सात दषकों की आजादी के फल अपेक्षाकृत साधन-संपन्न लोगों को ही मिले हैं। रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी इस बात का प्रमाण है। इस सब्सिडी का लाभ धनाढ्य और साधन-सपन्न लोगों को कहीं ज्यादा मिल रहा है क्योकि उनकी रसोई में कहीं ज्यादा एलपीजी का प्रयोग होता है। मध्यम वर्ग भी इसी साधन-सपन्न का हिस्सा है। आर्थिक विकास की सार्थकता भी तभी है जब वह अमीर और गरीब के बीच का फासले को कम करे। बहरहाल, हम फिरंगी षासन से भले ही आजाद हो गए हों मगर फिरंगी मानसिकता और गुलामी से आजाद नहीं हो पाए हैं। गुलामी विदेषी षासक की हो या स्वदेषी की, दोनों की स्थिति में मानव विकास विरोधी है। हमें क्या करना है,  मनन करें और उस पर अमल करें।  स्वत्रंतता दिवस के पावन अवसर पर हमें कुछ संकल्प लेने चाहिए ताकि हम वास्तव में आजाद हो सकें।