मंगलवार, 21 अगस्त 2018

अफस्पा की न्यायिक समीक्षा

जम्मू-कश्मीर  और  मणिपुर समेत  पूर्वोतर राज्यों में लंबे समय से लागू अफस्पा को लेकर  मानवाधिकारों के पैरवीकार और  राजनीतिक दल इसे हटाने की पुरजोर मांग करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर   की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ सरकार में रहते हुए भी  राज्य से अफस्पा को हटाने की मांग करती रही हैं । मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला ने राज्य से अफस्पा को हटाने के लिए सोलह साल तक विश्व  की सबसे लंबी भूख हडताल की थी। मगर सरकार ने मणिपुर से अफस्पा नहीं हटाया। मणिपुर (नगर पालिका क्षेत्र इफाल को छोडकर), असम और नगालैंड में अफस्पा पिछले साठ साल से लागू है। 1990 से जम्मू-कश्मीर   में भी यह कानून लागू है। इससे पहले 1983 में  पंजाब और केन्द्रीय प्रशासित चंडीगढ में भी अफस्पा लागू रहा है। 1997 में  इसे पंजाब-ंचंडीगढ से हटा लिया गया था। इसके तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी गोली मारने और बगैर वारंट के गिरफ्तार करने का विशेष  अधिकार दिया गया है। 1958 को संसद द्वारा आर्म्ड फोर्स  स्पेशल पॉवर एक्ट (अफस्पा) बनाए जाने पर उसी साल एक सितंबर से इसे पूर्वोतर राज्यों- असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल पदेश , मिजोरम और नगालैंड में लागू कर दिया गया था। इन राज्यों को तब “डिस्टर्बड“ माना गया था। मई, 2015 से त्रिपुरा से अफस्पा हटा लिया गया था। अप्रैल, 2018 से अफस्पा मेघालय से भी हटा  लिया गया है। असम और नगालैंड में यह अभी भी लागू है। अरुणाचल प्रदेश  में अब यह कानून केवल असम के साथ लगते तीन जिलों में प्रभावी है। मानवाधिकारों  संगठनों का आरोप है कि इस कानून के लागू होने से संबंधित राज्यों की जनता को खामख्वाह स्टेट और सीमा पार  पोषित  आतंक के  पिसना  पड रहा है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र  संघ भी  कश्मीर और  मणिपुर में मानावाधिकारों को दबाए जाने पर खासा चिंतित है़। सुप्रीम कोर्ट भी इस बात से सहमत है कि आंतक और हिंसा नियंत्रण की आड में एक्स्ट्रा ज्युडिशियल हत्याओं की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने कहा था साठ साल से ज्यादा समय से अगर किसी राज्य में अफस्पा लागू है, तो मानवीय सरोकारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अप्रैल, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया था कि निर्दोष  लोगों की हत्या के मामलों में सेना की आंतरिक जांच ही पर्याप्त है। न्यायालय ने मणिपुर में  सेना, असम राइफल्स और राज्य पुलिस द्वारा  2000 से 2012  के दौरान 1528 एक्स्ट्रा ज्युडिशियल हत्याओं के लिए सीबीआई को विशेष  जांच टीम (एसआईटी) गठित करने के आदेश  दिए थे। इसके बाद मणिपुर में हत्याओं के लिए सुरक्षा बलों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज  हुई थी।  सेना ने न्यायालय में दलील दी थी कि सुरक्षा बलों की हर कार्रवाई के लिए न्यायिक जांच कराने से उनका मनोबल टूट जाएगा और इससे आतंक के खिलाफ जारी मुहिम कमजोर पड जाएगी। मणिपुर और जम्मू-कश्मीर  में एफआईआर दर्ज किए जाने से क्षुब्ध लगभग तीन सौ फौजियों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर रखी है। सोमवार को इस पर सुनवाई भी हुई और अब अगली सुनवाई चार सितंबर को रखी गई है। न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले को उसी बेंच के हवाले कर दिया, जिसने पिछले साल एफआईआर दर्ज करने के आदेश  दिए थे। बहरहाल, न्याय का तकाजा है कि कानून-व्यवस्था का तब तक ही सम्मान रह सकता है, जब तक हर बात की संपूर्ण  जवाबदेही रहे। कानून का सम्मान करने वाले सभ्य समाज में  किसी को भी न्यायपालिका से ऊपर नहीं माना जा सकता। हर कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा होनी ही चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना है कि अफस्पा का दुरुपयोग करने वालों पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए या नहीं। शीर्ष   अदालत के फैसले से मानवाधिकारों के उल्लघंन का षोर मचाने वाले भी  शांत  हो जाएंगे।