विनाशाकारी बाढ के मंजर से लगभग एक माह पहले जल प्रबंधन पर एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि जल प्रबंधन के मामले में दक्षिण भारत बेहद खराब स्थिति में है। केरल को उन चार हिमालयन राज्यों के साथ सबसे निचले पायदान पर रखा गया था, जो बाढ की दृष्टि से सबसे ज्यादा असु्ररक्षित हैं। एक महीने के भीतर इस रिपोर्ट की सत्यता स्थापित हो गई। केरल में इस बार सौ साल की प्रलंयकारी बाढ ने 300 से ज्यादा लोगों को लील लिया है और 19000 करोड रु की संपति का नुकसान हो चुका है। तबाही का मंजर इतना भयावह है कि सात लाख से ज्यादा परिवार उजड चुके हैं और राहत शिविरों में रह रहे हैं। 1000 हजार घर पूरी ढह गए हैं और 26000 ध्वस्त होने की कगार पर हैं। 16000 लंबी पीडब्ल्यूडी और 82,000 स्थानीय सडकें पूरी तरह टूट चुकी हैं। शनिवार को प्रधानमंत्री ने बाढग्रस्त केरल का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद पांच सौ करोड रु की केन्द्रीय मदद का ऐलान किया। भारी नुकसान की तुलना में हालांकि यह मदद नाकाफी है मगर पूरा देश इस समय बाढग्रस्त केरल के साथ खडा है। केरल में कुल मिलाकर 44 नदियां बहती है उन पर छोटे-बडे 42 जलाषय हैं। पिछले सप्ताह जब नदियां उफान पर थी, सभी जलाशयों से पानी छोडा गया था। बांधों से पानी छोडे जाने के कारण बाढ की स्थिति और अधिक बदतर हो गई है। और यह सब कमजोर जल प्रबंधन को दर्शाता है। अगर बरसात आते ही जलाशयों से थोडा-थोडा पानी छोडा जाता, स्थिति इतनी खराब नहीं होती। केरल के पास जलाशयों से पानी छोडना का काफी समय था। केन्द्रीय गूह मंत्रालय ने भी अपने आकलन में केरल को बाढ के लिए सबसे असुरक्षित राज्यों में रखा था और राज्य सरकार को आगाह भी कर दिया गया था। 2015 में चैन्नई में आई भीषण बाढ से भी राज्य ने कोई सबक नहीं सीखा है। देश में हर साल मॉनसून बारिश से भारी तबाही होती है। मॉनसून के दौरान जल निकासी का समुचित प्रबंध नहीं होने से बाढ आती जरुर है। अस्सी फीसदी से ज्यादा वस्तुओं का बीमा नहीं होने के कारण हर साल बाढ से ही 70 हजार करोड रु का नुकसान हो रहा है। इस बार अब तक देश भर में बाढ से 868 लोग मारे जा चुके हैं। पिछले 71 साल में बाढ, सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से देश को छह लाख करोड रु से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। सबसे ज्यादा नुकसान सूखे के कारण हुआ है। आजादी के बाद से अब तक सूखे से 15 लाख लोग मौत के आगोश में समा गए हैं। बाढ में 70,343 लोगों को अपने प्राण गंवाने पडे हैं। एशिया की सबसे बडी नदी बहृपुत्र हर साल असम मे तबाही का प्रलंयकारी मंजर मचाती है। सबसे बडी त्रासदी है कि एक तरफ गर्मियों में देश को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पडता है मगर बरसात में अत्याधिक पानी को संरक्षित रखने के समुचित प्रबंध नहीं है। सरकार की बंदइंतजामी का आलम यह है कि बरसात से पहले बाढ से बचने के के बडे-बडे दावे किए जाते हैं मगर बरसात पडते ही सारे दावे फुस्स हो जाते हैं। बाढ से बचने के लिए भारत को भी “हर नदी-नले पर जगह जगह जलाशय और डैम बनाने चाहिए ताकि भारी बारिश पडने पर पानी का इनमें संग्रह किया जा सके। हालैंड ने इसे सफलतापूर्वक आजमाया है। जल प्रबंधन में इजरायल भी काफी आगे है। बाढ और सूखे से देश को आज तक जितना नुकसान हुआ है, उससे लाखों नहीं तो , हजारों जलाशय बनाए जा सकते थे। माना बाढ को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता मगर इसकी तबाही को कम जरुर किया जा सकता है और सूखे की साल-दर-साल त्रासदी से बचा जा सकता है।
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