अंतरराष्ट्रीय मामलों में हालांकि उम्मीदों की लंबी छलांगें लगाना खतरनाक माना जाता है मगर आशाएं-अपेक्षाएं तो पंख लगाकर उडती ही हैं। यथार्थवादी कूटनीति अथवा सामरिक विवशताएं भी उम्मीदों को उडने से रोक नहीं पाती। उतर कोरिया और दक्षिण कोरिया का हाथ मिलाना और भारत-पाकिस्तान सेनाओं का संयुक्त सैन्य अभ्यास ऐसी सकारात्मक घटनाएं हैं, जो भारतीय उपमहाद्धीप में शांति और आर्थिक प्रगति के लिए राम बाण साबित हो सकती हैं। इन घटनाएं से उम्मीद जगी है कि क्या भारत और पाकिस्तान भी उत्तर-दक्षिण कोरिया की तरह हाथ मिला सकते हैं? दूसरे विश्व युद्ध में विभाजन के बाद उत्तर और दक्षिण कोरियाई तीन साल तक लंबी लडाई लड चुके हैं। इस युद्ध की विभीषका भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तीन युद्धों से कहीं ज्यादा वीभत्स है मगर कोरियाई जनमानस इसे भुला कर गले मिल रहा है। भारत और पाकिस्तान की ही तरह पिछले 68 साल में उत्तर और दक्षिण कोरिया एक दूसरे को लाखों टन युद्ध की धमकियां और टनों वजनी गालियां देने के बाद अततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सुकून से जीना है तो पडोसी से हाथ तो मिलाना ही पडता है। इसी जमीनी सच्चाई को स्वीकारते हुए भारत और चीन ने वुहान में तय किया कि सीमा पर तनाव खत्म करके दोनों देश प्रगति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ सकते हैं और इसी में एशिया के दो ताकतवर देशों के अवाम की भलाई भी है। इतिहास इस बात का गवाह है कि युद्ध से मानवता का कोई भला नहीं हुआ है और न ही हो सकता है। मौजूदा समय का परंपरागत युद्ध की बजाए परमाणु युद्ध कहीं अधिक तबाही मचा सकता है। उत्तर और दक्षिण कोरिया ने इस कडवी सच्चाई को अंगीकार किया है। अगर पूर्वी और पश्चिम जर्मनी, उत्तर और दक्षिण विएतनाम सारी कटुता भुला कर एक हो सकते हैं तो उत्तर और दक्षिण कोरिया क्यों नहीं? 45 साल तक विभाजित रहने के बाद अक्टूबर 1990 में पूर्वी और पश्चिम जर्मनी फिर एक हो गए और “बर्लिन की दीवार“ को तोड डाला। इससे पहले 1976 में उत्तरी (डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ विएतनाम) और दक्षिण विएतनाम (रिपब्लिक ऑफ साउथ विएतनाम) भी एक हो गए थे। संभव है उत्तर और दक्षिण कोरिया भी एक हो जाएं। इच्छा शक्ति हो तो सब कुछ मुमकिन है । जर्मन और विएतनाम का एकीकरण इसलिए संभव हुआ कि दोनों देशों की नस्ल एक थी। भाषा , रंग-रुप, यहां तक कि कद -काठी भी एक जैसे हैं। कोरियाई लोग भी ऐसे ही हैं। जर्मन, कोरियाई और विएतनाम विभाजन युद्ध और बडी ताकते के बीच युद्ध और साम्राज्यवादी भूख की निशानियां हैं । परिस्थितिया अनुकूल होते ही इन देशों का हाथ मिलाना और एक होना तय था मगर भारत और पाकिस्तान के बीच इस तरह की उम्मीद रखना “मुंगेरी लाल के हसीन सपनो जैसा है“। चीन भी चाहे तो भी भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की कटुता कम नहीं हो सकती। और सच्चाई यह भी है कि मुस्लिम बहुल पाकिस्तान हिंदू बहुल भारत के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। और भारत के कट्टरपंथी हिंदू मुस्लिम बहुल पाकिस्तान को “ आंख की किरकिरी“ मानते हैं। भारत चीन से गठजोड कर सकता मगर पाकिस्तान से नहीं। खुदा-न-खास्ता अगर कभी ऐसी संभावनाएं बनती भी हैं, दोनों मुल्कों के कट्टरपंथी ऐसा होने ही नहीं देंगे। सितंबर में रुस में होने वाले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं का संयुक्त अभ्यास भी दोनों देशों के बीच विभाजन की कटुता को कम नहीं कर सकता। यह सैन्य अभ्यास आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के मकसद से आयोजित किया जा रहा है। शंघाई सहयोग संगठन इस सैेन्य अभ्यास का आयोजन कर रहा है और इस पर चीन का प्रभुत्व है। पाकिस्तान सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए इस अभ्यास में शरीक हो रहा है। मगर संवाद की प्रकिया तो जारी रहनी ही चाहिए।
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