अन्नदाता इतना बेहाल क्यों?
दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का अन्नदाता बेहाल है। और अगर अन्नदाता ही बेहाल है, तो लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा हो जाता है। खून-पसीना बहाकर तैयार की गई उपज के दाम पाने के लिए किसानों को सडकों पर उतरना पडता है और पुलिस के डंडे खाने पडते है। इसके विपरीत क्या कभी सेठ या साहूकार अथवा धनाढ्य वर्ग अपने हक के लिए सडकों पर लडते देखा गया है? देश में अन्नदाताओं की त्रासदी यह है कि 65 फीसदी किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। कृषि विशेषज्ञों का ही आकलन है कि एक हेक्टेयर से कम जमीन पर खेती लाभदायक नहीं है। इसका यह मतलब निकलता है कि देश का 65 फीसदी किसान घाटे की खेती कर रहा है। किसानों में आत्महत्या की बढती प्रवृति के लिए भी यही स्थिति जिम्मेदार है। बुधवार को पंजाब के गन्ना उत्पादकों को पिछले साल की उपज का बकाया मांगने के लिए सात घंटे तक राष्ट्रीय उच्च मार्ग (नेशनल हाईवे) जाम करना पडा। तब कहीं जाकर पंजाब सरकार जागी और गन्ना उत्पादकों के बकाया का जल्द से जल्द भुगतान का वायदा किया। शुगर मिल्स अभी तक गन्ना उत्पादकों की पिछले साल की फसल का भुगतान नहीं कर पाई हैं जबकि अगली फसल नवंबर माह में मिलों में पहुंचने वाली है। पंजाब में कुल मिलाकर 16 शुगर मिलें हैं। इनमेंसे 9 सहकारी हैं तो 7 निजी। हर साल गन्ना उप्पादकों को षुगर मिलों से अपना पैसा लेने के लिए लडना पडता है। पंजाब में शुगर मिल्स बेहद अव्यवस्थित है और हर साल आर्थिक तंगी का रोना रोती है। शुगर मिलों का कथन है कि गन्ना के समर्थन मूल्य और चीनी के दाम में सांमजस्य नहीं होने से उन्हें साल-दर-साल घाटा हो रहा है। सरकार शुगर मिलों की राय और बाजार में जमीनी स्थिति को जाने बगैर हर साल गन्ने का समर्थन मूल्य बढा रही है। इससे शुगर मिलों की वित्तीय स्थिति हर साल बिगडती जा रही है। निजी शुगर मिलों ने इस साल मिलों को बंद रखने की धमकी दे रखी है। इसी सप्ताह राज्य सरकार ने शुगर इंडस्ट्री की समस्याओं का हल निकालने के लिए उच्च स्तरीय समिति भी बनाई है। हालांकि सहकारी मिलों की तुलना में राज्य में निजी मिलें कम हैं, मगर 70 फीसदी गन्ने की पिराई निजी क्षेत्र की मिलें ही करती हैं। इस स्थिति के दृष्टिगत अगर निजी शुगर मिलें पिराई नहीं करती हैं, तो राज्य के गन्ना उत्पादकों की फसल बर्बाद हो सकती हैं। किसानों को गन्ने की फसल उगाकर सबसे ज्यादा फायदा होता है। एक तो गन्ने की फसल की लागत कम है, उस पर खडी फसल को प्राकृतिक आपदा अथवा पशु -पक्षियों और कीटों से नुकसान भी कम होता है। भारतीय कृषि पर किए गए नेशनल सेंपल सर्वे का आकलन है कि आम किसान औसतन माहवार 6426 रु की कमाई करता है। सीमांत (मार्जिनल) किसान माहवार 4000 रु से भी कम कमाता है। इसमें खेती के अलावा, दुधारु पशु और अन्य गैर-कृषक कार्यों की आमदन भी शामिल है। सबसे ज्यादा गन्ने से कमाई होती है। छह माह के सीजन में गन्ने से 50000 रु और गेंहू और धान से लगभग 30,000 रु की आय होती है। इनपुटस पर 30 फीसदी लागत आती है। सर्वे में यह भी पाया गया है कि आम किसान आधी से ज्यादा फसल अपने उपभोग के लिए रख लेता है। और बाजार में अधिकतर फसल आढतियों को दी जाती है। किसान को फसल का समर्थन मूल्य मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इन हालात में किसान अपनी-गुजर बसर करने के लिए साहूकारों और आढतियों से कर्जा लेता है। हर किसान के पास औसतन 47,000 हजार का कर्जा है। देश का 50 फीसदी से अधिक किसान कर्ज-दर-कर्ज में डूबा है। इन तथ्यों से पता चलता है कि किसान कितना बेहाल है।
दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का अन्नदाता बेहाल है। और अगर अन्नदाता ही बेहाल है, तो लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा हो जाता है। खून-पसीना बहाकर तैयार की गई उपज के दाम पाने के लिए किसानों को सडकों पर उतरना पडता है और पुलिस के डंडे खाने पडते है। इसके विपरीत क्या कभी सेठ या साहूकार अथवा धनाढ्य वर्ग अपने हक के लिए सडकों पर लडते देखा गया है? देश में अन्नदाताओं की त्रासदी यह है कि 65 फीसदी किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। कृषि विशेषज्ञों का ही आकलन है कि एक हेक्टेयर से कम जमीन पर खेती लाभदायक नहीं है। इसका यह मतलब निकलता है कि देश का 65 फीसदी किसान घाटे की खेती कर रहा है। किसानों में आत्महत्या की बढती प्रवृति के लिए भी यही स्थिति जिम्मेदार है। बुधवार को पंजाब के गन्ना उत्पादकों को पिछले साल की उपज का बकाया मांगने के लिए सात घंटे तक राष्ट्रीय उच्च मार्ग (नेशनल हाईवे) जाम करना पडा। तब कहीं जाकर पंजाब सरकार जागी और गन्ना उत्पादकों के बकाया का जल्द से जल्द भुगतान का वायदा किया। शुगर मिल्स अभी तक गन्ना उत्पादकों की पिछले साल की फसल का भुगतान नहीं कर पाई हैं जबकि अगली फसल नवंबर माह में मिलों में पहुंचने वाली है। पंजाब में कुल मिलाकर 16 शुगर मिलें हैं। इनमेंसे 9 सहकारी हैं तो 7 निजी। हर साल गन्ना उप्पादकों को षुगर मिलों से अपना पैसा लेने के लिए लडना पडता है। पंजाब में शुगर मिल्स बेहद अव्यवस्थित है और हर साल आर्थिक तंगी का रोना रोती है। शुगर मिलों का कथन है कि गन्ना के समर्थन मूल्य और चीनी के दाम में सांमजस्य नहीं होने से उन्हें साल-दर-साल घाटा हो रहा है। सरकार शुगर मिलों की राय और बाजार में जमीनी स्थिति को जाने बगैर हर साल गन्ने का समर्थन मूल्य बढा रही है। इससे शुगर मिलों की वित्तीय स्थिति हर साल बिगडती जा रही है। निजी शुगर मिलों ने इस साल मिलों को बंद रखने की धमकी दे रखी है। इसी सप्ताह राज्य सरकार ने शुगर इंडस्ट्री की समस्याओं का हल निकालने के लिए उच्च स्तरीय समिति भी बनाई है। हालांकि सहकारी मिलों की तुलना में राज्य में निजी मिलें कम हैं, मगर 70 फीसदी गन्ने की पिराई निजी क्षेत्र की मिलें ही करती हैं। इस स्थिति के दृष्टिगत अगर निजी शुगर मिलें पिराई नहीं करती हैं, तो राज्य के गन्ना उत्पादकों की फसल बर्बाद हो सकती हैं। किसानों को गन्ने की फसल उगाकर सबसे ज्यादा फायदा होता है। एक तो गन्ने की फसल की लागत कम है, उस पर खडी फसल को प्राकृतिक आपदा अथवा पशु -पक्षियों और कीटों से नुकसान भी कम होता है। भारतीय कृषि पर किए गए नेशनल सेंपल सर्वे का आकलन है कि आम किसान औसतन माहवार 6426 रु की कमाई करता है। सीमांत (मार्जिनल) किसान माहवार 4000 रु से भी कम कमाता है। इसमें खेती के अलावा, दुधारु पशु और अन्य गैर-कृषक कार्यों की आमदन भी शामिल है। सबसे ज्यादा गन्ने से कमाई होती है। छह माह के सीजन में गन्ने से 50000 रु और गेंहू और धान से लगभग 30,000 रु की आय होती है। इनपुटस पर 30 फीसदी लागत आती है। सर्वे में यह भी पाया गया है कि आम किसान आधी से ज्यादा फसल अपने उपभोग के लिए रख लेता है। और बाजार में अधिकतर फसल आढतियों को दी जाती है। किसान को फसल का समर्थन मूल्य मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इन हालात में किसान अपनी-गुजर बसर करने के लिए साहूकारों और आढतियों से कर्जा लेता है। हर किसान के पास औसतन 47,000 हजार का कर्जा है। देश का 50 फीसदी से अधिक किसान कर्ज-दर-कर्ज में डूबा है। इन तथ्यों से पता चलता है कि किसान कितना बेहाल है।






