शनिवार, 5 सितंबर 2015

Saluting Teachers Not Enough, Follow Their Ideals

                               शिक्षक की महिमा

दुनिया में माता-पिता के बाद सबसे ज्यादा अहमियत शिक्षक  की ही मानी गई है। शिक्षक  न केवल इंसान को गुणवान बनाता है, बल्कि उसमें ज्ञान का अलख जगाकर और अनुशासन का पाठ पढा कर उसे सर्वोगुणी बनाता है। इसलिए पूरी दुनिया में अलग-अलग दिन और अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है।  भारत में महान षिक्षक सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृश्णन के जन्मदिन  5 सितंबर को  शिक्षक मनाया जाता है जबकि विश्व  शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। सभ्य और उन्नत समाज के निर्माण में शिक्षकों के महत्व एवं योगदान को उजागर करने के मकसद से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत की ही तरह अर्जेटीना अपने महान षिक्षाविद, लेखक एवं राजनीतिज्ञ डोमिंगो फास्तिनो सरमिंतो की पुण्य तिथि 11 
सितंबर को  शिक्षक दिवस के रुप में मनाता है। जिस तरह भारत में  डॉक्टर राधाकृष्णन  शिक्षक से  राष्ट्रपति  (1962-67) तक  के सर्वोच्च पद को सुशोभित किया, ठीक उसी तरह अर्जेटीना में  डोमिंगो फास्तिनो  भी देष के सातवें राष्ट्रपति  (1868से 1874) रहे। महान शिक्षक के काम भी  वैेसे ही होते हैं।  डॉक्टर राधाकृष्णन का अपने छात्रों से बेहद लगाव था और वे उनका हर तरह से ख्याल रखते थे। पंडित मदन मोहन मालवीय के बाद   डॉक्टर राधाकृष्णन बनारस विश्वविधालय  के कुलपति बने। 1945 में बनारस विश्वविधालय  के छात्र रहे पी रामालिंगम परिसर खुलने के तीन दिन पहले ही बनारस पहुंच गए। सभी हॉस्टल बंद थे और उन्हें जब कुछ नहीं सूझा तो किसी की मदद से वे  कुलपति से मिलने पहुंच गए।  डा. राधाकृश्णन तब बीएचयू के कुलपति थे। उन्होंने तत्काल हॉस्टल वार्डन को बुलाकर छात्र रामालिंगम के रहने की व्यवस्था करने को कहा।  डा. राधाकृष्णन कभी भी किसी छात्र को तकलीफ में नहीं देख सकते थे। बनारस  विश्वविधालय के ही कुलपति रहे आचार्य नरेन्द्र देव भी महान शिक्षक थे। उनके बारे भी यही कहा जाता है कि वे भी छात्रों को कभी मुसीबत में नहीं देख सकते थे। कहते हैं 1947 में जब वे लखनऊ विश्वविधालय के कुलपति थे,  हॉस्टलों में रहने के लिए जगह कम पड गई। तब आचार्य ने अपने सरकारी आवास को छात्रों के लिए खाली कर दिया और खुद एक कमरे में गुजारा किया।  शिक्षकों के अहम योगदान के  दृष्टिगत पद संभालने के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार स्कूली छात्रों से सीधे संवाद कर रहे हैं। शुक्रवार को शिक्षक दिवस के एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने फिर छात्रों से “मन की बातें” की और इस दौरान छात्रों ने उनसे तरह-तरह के सवाल भी किए। देश के  प्रधानमंत्री अगर शिक्षक बनकर खुद छात्रों से सीधा संवाद करते हैं, तो यह अच्छी परंपरा है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से शिक्षा और शैक्षणिक स्तर का पतन हो रहा है, उसका ख्याल करते हुए  इसमें आमूल-चूल सुधार लाने की अविलंब जरुरत है। समकालीन भारत में वास्तविक शैक्षणिक संस्थाएं की  बजाए  शिक्षा की दुकानें  बन  गईं हैं। आर्थिक उदारीकरण के जमाने में स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज पैसा कमाने का जरिया बन गए हैं। पैसे के बल पर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आसानी से एडमिशन मिल जाती है। कोचिंग और ट्यूशन की आड में बडी-बडी दुकानें खुल गईं है जो पैसा लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में अव्वल आने की गारंटी देती हैं। शैक्षणिक जगत  में भी अब पैसा ही सर्वोपरि हो गया है। और यह सब सरकार की नाक के नीचे हो रहा है। एक जमाना था जब कहा जाता था “गुरु बिना ज्ञान नहीं“। अब सब कुछ बदल गया है। अब कहा जाता है “गूगल बिना ज्ञान नहीं“। प्रधानमंत्री ने खुद छात्रों से कहा है “ यू आर  गूगल गुरु विधार्थी“।  इन हालात में न तो शिक्षा का कोई महत्व रह जाता है, और न ही शिक्षक का। तथापि,  शिक्षक के महत्व को भुलाए  नहीं भूलाया जा सकता।  इंटरनेट अथवा टकनॉलॉजी गुरु का स्थान नहीं ले सकती।  शिक्षकों को कोटि-कोटि नमन।