शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

Smart Village Idea Stares at us Amid Increasing Dengue Casualties

Smart Village Idea Stares at us Amid Increasing Dengue Casualties 

  मोदी सरकार का “स्मार्ट सिटी“ की तर्ज पर ”स्मार्ट विलेज” बनाने के  निर्णय पर एक  शेर याद आता है “ वायदा करने वाले बहुत देखे, मगर निभाते देखा नहीं है कोई“। मिशन तो बहुत अच्छा है मगर इसे पूरा किया जाएगा, इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सरकार के पास  देश  की राजधानी  दिल्ली में डेंगू  से लड़ने के लिए धन नहीं  है। लोगों में अब यह धारणा बन गई है कि  मोदी सरकार “ आगे दौड, पीछे चौड“ जैसा काम कर रही है। केन्द्र में सरकार बनाते ही प्रधानमंत्री ने सबसे पहले गंगा को अविलंब स्वच्छ बनाने का ऐलान किया मगर डेढ साल में इस योजना में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। संप्रग सरकार के समय से “मैली“ गंगा को स्वच्छ करने का काम चल रहा है। मोदी सरकार ने अभी तक कोई बडा करिश्मा  नहीं कर दिखाया है। स्मार्ट  गांव मिशन की तरह संप्रग सरकार ने “पूरा“ (गांवों में शहरी सुविधाएं) नाम की योजना चलाई थी। मोदी सरकार नया नामकरण करके इसी योजना को आगे बढा रही है।  लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने लोगों को चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने का वायदा किया था। यह वायदा भी झूठा ही निकला।  निसंदेह, देश  की तरक्की और खुशाहली का रास्ता गांवों से होकर ही  गुजरता है। इसलिए जब तक गांव स्मार्ट  नहीं होंगे  और शहर स्मार्ट  हो भी जाएं, देेश  स्मार्ट नहीं हो सकता। गांवों को स्मार्ट  बनाना  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था। वैसे भी विशाल आबादी वाले श हरों की अपेक्षा 25 से 50 हजार आबादी वाले गांव को “स्मार्ट“ बनाना ज्यादा व्यावहारिक हैं।  ”स्मार्ट विलेज” योजना के तहत केन्द्र सरकार मौजूदा योजनाओं के लिए 30 फीसदी वित्तीय मदद देगी और बाकी 70 फीसदी विलेज क्लस्टर को अपने स्तर पर खुद जुटानी होगी। इस मिशन का लक्ष्य गांवों को ऐसे समूह के तौर पर विकसित करना है, जहां लोगों को स्वरोजगार मिले और कुशल कारीगरों की कमी न हो। लेकिन गांवों की सबसे बडी समस्या यह है कि लाभकारी रोजगार के अभाव में उसके कुशल कारीगर  भी बेहतर रोजगार की तलाश  में शहर पलायन कर जाते हैं। इस मामले में चिकित्सा और इंजीनियरिंग व्यवसाय की ही मिसाल ली जा सकती है। गांव में जन्मे और वहां के स्कूलों में पढे युवक डाक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक  बनते ही शहरी हो जाते हैं अथवा विदेशों  का रुख कर लेते हैं, क्योंकि गांवों में  शहरों जैसी सुविधाएं नहीं हैं। गांव में न तो स्वच्छ पेयजल मिलता है और न ही चौबीस घंटे माकूल बिजली। भारत में आज भी ऐसे कई शहर और गांव हैं जो नदियों के समीप बसे होने के बावजूद पेयजल  की समस्या से पीडित है। रात-दिन (चौबीस घंटे की एमरजेंसी सेवाएं ) की स्वास्थय सेवाएं अधिकांश  गांव में उपलब्ध नहीं है। सीवेरेज सुविधा नहीं होने से स्वच्छता अभी भी गावों से कोसों दूर है। पक्की तो क्या कच्ची सडकें भी नहीं है।  समकालीन भारत में बेहतर स्कूली शिक्षा अनिवार्य  मानी जाती है। गांवों के स्कूलों में कैसी शिक्षा मिलती है,इस सच्चाई को सभी जानते हैं। केन्द्र सरकार ने ”स्मार्ट  विलेज“ के लिए जो शर्ते रखी हैं, अगर उन सभी का प्रबंध हो जाए तो गांव खुद-ब-खुद समार्ट हो जाएंगे। मगर  इन शर्तों पर खरा उतरना पहाड चढने जैसा है। भारत में लगभग 6 लाख 40 हजार गांव हैं। इनमेंसे मात्र 3976 गावों की आबादी 10,000 अथवा उससेे ज्यादा है।  2, 36, 204 गांवों की आबादी 500 से भी कम है। इस स्थिति में 25,000 से 50,000 की आबादी वाले गांव का समूह बनाना आसान नहीं है। बिहार विधानसभा चुनाव की बेला पर “स्मार्ट विलेज“ मिशन के ऐलान से राजनीति की “बू“ आ रही है। बिहार के 45, 908 गांवों मेंसे अधिकांश  बदहाल है। स्मार्ट  विलेज का मतलब आत्मनिर्भरता से होना चाहिए। यानी गांव बिजली, पानी से लेकर हर बुनियादी सुविधा खुद जुटाए। क्या सरकार विलेज को इतना स्मार्ट बना सकती है? जिस देष के गांवों में लोगों को माकूल बिजली और पीने का पानी तक न मिले वहां  “स्मार्ट विलेज“ की परिकल्पना भी “मुगेरी लाल के हसीन सपने “ जैसा लगती है।