शनिवार, 12 सितंबर 2015

Aur Murdon Se Bhi Darr Lagataa Hai....

                                                     मुर्दों से भी डर लगता है,,

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चंडीगढ यात्रा इस बार अफसाना बन कर रह गई है। मोदी  शुक्रवार  को लगभग चार घंटों के लिए चंडीगढ की यात्रा पर क्या आए, प्रशासन ने पूरे शहर को सील ही कर दिया। स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए। पंजाब यूनिवर्सिटी भी नही खुली। प्रधानमंत्री के रास्ते में पडने वाले तमाम सेक्टरों मे स्थित दुकानें भी बंद करवा दी गई। लोगों को उनके सामने खडे होने तक नहीं दिया गया। और-तो-और चंडीगढ में सेक्टर 25 का श्मशान  घाट भी बंद कर दिया गया। इससे  शोकग्रस्त  परिवारों को शव जलाने के लिए दूसरी जगह तलाशनी पडी। मोदी की रैली के लिए श्मशान घाट में प्रधानमंत्री के लौट जाने तक दाह-संस्कार की अनुमति नहीं दी गई। पहली बार चंडीगढ में प्रधानमंत्री के आगमन पर सुरक्षा का इतना जबरदस्त बंदोबस्त किया गया। डाक्टर मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री कई बार चंडीगढ आए मगर उनके समय भी सुरक्षा का इतना भीषणतम नंगा नाच नहीं किया गया। डाक्टर मनमोहन सिंह के चंडीगढ दौरे के समय एक बार एम्बुलेंस को रास्ता न मिलने के कारण रोगी की पीजीआई पहुंचने से पहले ही मौत हो गई थी। तब भाजपाइयों ने इस मामले को लेकर आसमान सर पर उठाया लिया था। विडबंना देखिए कि अब वही भाजपाई प्रधानमंत्री की सुरक्षा का हवाला देकर अभूतपूर्व सुरक्षा बंदोबस्त से लोगों को हुई असुविधा को जायज ठहरा रहे  हैं।प्रधानंमंत्री को चंडीगढ में नए अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट  के उदघाटन के अलावा, पीजीआई के क्न्वोकेशन में शरीक होना था। उन्हें चंडीगढ हाउसिंग बोर्ड  के कार्यक्रम में भी भाग लेना  था और रैली को भी संबोधित करना था। कुल मिलाकर लगभग चार घंटों के लिए प्रधानमंत्री चंडीगढ में थे मगर इस दौरान लोगों को जो असुविधाएं हुईं, उसकी सानी नहीं मिल सकती। इससे ज्यादा असुविधाजनक स्थिति और क्या हो सकती है कि लोगों को मुर्दों का अंतिम संस्कार करने की अनुमति भी न दी जाए। यहां तो फिरंगी राज से भी हद कर दी गई । फिरंगी में भी “लाट साहब“ हर हाल में मुर्दों का अंतिम संस्कार करने की अनुमति दिया करते थे। इसके क्या अर्थ निकाले जाएं? क्या अब भारत के प्रधानमंत्री इतने असुरक्षित हैं कि उनकी सुरक्षा को मुर्दों से भी खतरा है? लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और अगर प्रधानमंत्री के दौरे से जनता को असुविधा होती है, तो इस तरह के कार्यक्रम की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। सर्वोच्च न्यायालय भी यह व्यवस्था दे चुका है कि जनता की असुविधा की कीमत पर कोई भी शासकीय कार्यक्रम नहीं किया  जाना चाहिए। फिर चाहे वह देश  का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। चंडीगढ  शहर मात्र 6 किलोमीटर की परिधि में फैला है और मोहाली तथा पंचकूला से सटा है। एयरपोर्ट  चंडीगढ के एक सिरे पर स्थित है तो पीजीआई और सेक्टर 25 दूसरे सिरे पर। इस स्थिति में प्रधानमंत्री के काफिले को शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक आना-जाना था। जाहिर है, इससे  शहरवासियों को असुविधा होनी ही थी। इस स्थिति का मीडिया पहले भी कई बार खुलासा कर चुका है। फिर प्रशासन और शहर के भाजपाईयों ने इस बात पर क्यों गौर नहीं किया। इससे पता चलता है कि प्रशासन और सियासी नेता जनता की कितनी फिक्र करते हैं। प्रधान मंत्री  मोदी स्वयं ऐसा कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी यात्रा के दौरान शहर के स्कूल, कॉलिज और श्मशान घाट  बंद कर दिए जाएं। छात्रों से “मन की बात“ में प्रधानमंत्री पढाई पर जोर देते रहे हैं। बाद में प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके चंडीगढ के लोगों से उनके दौरे के दौरान हुई असुविधा के लिए क्षमा भी मांगी और जांच के आदेश  भी दिए। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लोंगो को जो असुविधा हुई, उसकी भरपाई क्षमा मांगकर नहीं की जा सकती।