धार्मिक जनगणना
मोदी सरकार ने अततः 2011 की सामाजिक-आर्थिक एव जाति जनगणना (सोसिओ -एकोमोमिक एंड कास्ट सेंसिस- एसईसीसी) के धर्म आधारित आंकडे मंगलवार को जारी कर ही दिए मगर जाति आधारित आंकडे फिर रोक लिए गए हैं। सरकार ने तीन जुलाई को इस जनगणना के आंकडे जारी किए थे। तभी से राजनीतिक दल जाति और धर्म आधारित आंकडे जारी करने की मांग कर रहे थे। देश के सामाजिक-आर्थिक समग्र विकास के लिए जनगणना का अपना महत्व होता है। इसी मकसद से हर 10 साल बाद जनगणना कराई जाती है। मार्च 2014 से धार्मिक जनगणना के आंकडे सरकार के पास थे। संप्रग सरकार ने लोकसभा चुनाव का हवाला देकर इन आंकडों को जारी नहीं किया था। इस साल जनवरी में मोदी सरकार ने धार्मिक जनगणना के आंकडे रोक दिए थे। इन आकंडों को जारी करने का समय काबिलेगौर है। दो माह बाद बिहार विधानसभा के चुनाव कराए जाने हैं। बिहार विधानसभा की समयावधि 29 नवंबर, 2015 को खत्म हो रही है। बिहार के चुनाव न केवल भाजपा के लिए, अलबत्ता नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के लिए भी कडी अग्नि परीक्षा है। चुनाव से कुछ समय पहले जनगणना के धार्मिक आंकडे जारी करने पर विपक्षी दल मोदी सरकार की नीयत पर शक कर रहे हैं। धार्मिक जनगणना के आंकडे बताते हैं कि जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढी है और हिंदुओं की घटी है। इस बात को भगवा पार्टी और उसके सहयोगी संगठन बिहार चुनाव में बहुसंख्यक हिंदुओं का धुव्रीकरण कराने के लिए जमकर भुना सकते हैं। 2011 की जनगणना के आकंडों अनुसार भारत में पहली बार हिंदुओं की आबादी 0.7 फीसदी गिरकर 80 फीसदी से नीचे आ गई है। इसकी तुलना में मुसलमानों की आबादी 0.8 प्रतिशत बढी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक 121 करोड की आबादी में 96.63 करोड हिंदू और 17.22 करोड मुसलमान हैं। तथापि, इन आंकडों का एक सकारात्मक पक्ष और भी है। पिछले दस सालों में हिन्दुओं और मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में कमी आई है। हिन्दू और मुसलमान ही नहीं, बल्कि ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध सभी धर्मों की आबादी वृद्धि दर कम हुई है। ऐसा जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आने के कारण हुआ है। 2001 की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 19.92 थी। 2011 में यह घटकर 16.76 रह गई । यानी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि में 3.16 की गिरावट दर्ज हुई है। मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि में हिंदुओं से भी ज्यादा गिरावट आई है। 2001 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की आबादी 29.5 फीसदी की दर से बढ रही थी। 2011 में यह घटकर 24.6 ही रह गई। यानी मुसलमानों की आबादी में दस सालों में 4.9 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट अन्य सभी धर्मों में भी दर्ज हुई है। और यह सब हिंदु और मुसलमानों द्वारा परिवार नियोजन अपनाने के कारण हुआ है। भारत के लिए सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि हिंदु हो या मुसलमान, दोनों की आबादी बहुत तेजी से बढ रही है। 1951 में हिंदुओं की आबादी 30.35 करोड थी। 2011 में यह बढ्कर 96.62 करोड हो जाएगी और 2021 तक सौ करोड को पार कर जाएगी। 1951 में 3.54 करोड मुस्लिम आबादी के मुकाबले 2011 में यह 17.22 करोड हो गई है। भारत में मुसलमानों की आबादी पाकिस्तान के बराबर है हालांकि कुछ साल पहले भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान बसते थे। सरकार द्वारा जारी धार्मिक जनगणना को सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। किस धर्म की आबादी बढ रही है और किसकी कम हो रही है, यह बात अहम नहीं है। मह्त्वपूर्ण यह है कि आबादी वृद्धि की विस्फोटक रफ्तार को हर हाल में रोका जाना चाहिए। इस मामले में भारत को चीन से सीख लेने की जरुरत है। चीन ने जनसंख्या वृद्धि पर सफलतापूर्वक रोक लगाई है।
मोदी सरकार ने अततः 2011 की सामाजिक-आर्थिक एव जाति जनगणना (सोसिओ -एकोमोमिक एंड कास्ट सेंसिस- एसईसीसी) के धर्म आधारित आंकडे मंगलवार को जारी कर ही दिए मगर जाति आधारित आंकडे फिर रोक लिए गए हैं। सरकार ने तीन जुलाई को इस जनगणना के आंकडे जारी किए थे। तभी से राजनीतिक दल जाति और धर्म आधारित आंकडे जारी करने की मांग कर रहे थे। देश के सामाजिक-आर्थिक समग्र विकास के लिए जनगणना का अपना महत्व होता है। इसी मकसद से हर 10 साल बाद जनगणना कराई जाती है। मार्च 2014 से धार्मिक जनगणना के आंकडे सरकार के पास थे। संप्रग सरकार ने लोकसभा चुनाव का हवाला देकर इन आंकडों को जारी नहीं किया था। इस साल जनवरी में मोदी सरकार ने धार्मिक जनगणना के आंकडे रोक दिए थे। इन आकंडों को जारी करने का समय काबिलेगौर है। दो माह बाद बिहार विधानसभा के चुनाव कराए जाने हैं। बिहार विधानसभा की समयावधि 29 नवंबर, 2015 को खत्म हो रही है। बिहार के चुनाव न केवल भाजपा के लिए, अलबत्ता नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के लिए भी कडी अग्नि परीक्षा है। चुनाव से कुछ समय पहले जनगणना के धार्मिक आंकडे जारी करने पर विपक्षी दल मोदी सरकार की नीयत पर शक कर रहे हैं। धार्मिक जनगणना के आंकडे बताते हैं कि जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढी है और हिंदुओं की घटी है। इस बात को भगवा पार्टी और उसके सहयोगी संगठन बिहार चुनाव में बहुसंख्यक हिंदुओं का धुव्रीकरण कराने के लिए जमकर भुना सकते हैं। 2011 की जनगणना के आकंडों अनुसार भारत में पहली बार हिंदुओं की आबादी 0.7 फीसदी गिरकर 80 फीसदी से नीचे आ गई है। इसकी तुलना में मुसलमानों की आबादी 0.8 प्रतिशत बढी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक 121 करोड की आबादी में 96.63 करोड हिंदू और 17.22 करोड मुसलमान हैं। तथापि, इन आंकडों का एक सकारात्मक पक्ष और भी है। पिछले दस सालों में हिन्दुओं और मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में कमी आई है। हिन्दू और मुसलमान ही नहीं, बल्कि ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध सभी धर्मों की आबादी वृद्धि दर कम हुई है। ऐसा जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आने के कारण हुआ है। 2001 की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 19.92 थी। 2011 में यह घटकर 16.76 रह गई । यानी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि में 3.16 की गिरावट दर्ज हुई है। मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि में हिंदुओं से भी ज्यादा गिरावट आई है। 2001 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की आबादी 29.5 फीसदी की दर से बढ रही थी। 2011 में यह घटकर 24.6 ही रह गई। यानी मुसलमानों की आबादी में दस सालों में 4.9 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट अन्य सभी धर्मों में भी दर्ज हुई है। और यह सब हिंदु और मुसलमानों द्वारा परिवार नियोजन अपनाने के कारण हुआ है। भारत के लिए सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि हिंदु हो या मुसलमान, दोनों की आबादी बहुत तेजी से बढ रही है। 1951 में हिंदुओं की आबादी 30.35 करोड थी। 2011 में यह बढ्कर 96.62 करोड हो जाएगी और 2021 तक सौ करोड को पार कर जाएगी। 1951 में 3.54 करोड मुस्लिम आबादी के मुकाबले 2011 में यह 17.22 करोड हो गई है। भारत में मुसलमानों की आबादी पाकिस्तान के बराबर है हालांकि कुछ साल पहले भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान बसते थे। सरकार द्वारा जारी धार्मिक जनगणना को सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। किस धर्म की आबादी बढ रही है और किसकी कम हो रही है, यह बात अहम नहीं है। मह्त्वपूर्ण यह है कि आबादी वृद्धि की विस्फोटक रफ्तार को हर हाल में रोका जाना चाहिए। इस मामले में भारत को चीन से सीख लेने की जरुरत है। चीन ने जनसंख्या वृद्धि पर सफलतापूर्वक रोक लगाई है।






