संसद का मौजूद मॉनसून सत्र खत्म होने को है मगर अभी तक रत्ती भर कामकाज नहीं हो पाया है। 21 जुलाई को शुरु हुआ सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। इंडियन प्रीमियम लीग (आईपीएल) के पूर्व कमिशनर ललित मोदी से अंतरंग संबंध रखने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और व्यापमं स्कैम में विवादास्पद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के त्यागपत्र पर अडी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संसद की कार्यवाही चलने नहीं दे रहे हैं। 18 दिनी के कामकाजी सत्र में अब तक आधे से ज्यादा समय बगैर कामकाज निपटाए गुजर गया है। सोमवार को भी सरकार और विपक्ष की बैठक बेनतीजा रही। कांग्रेस स्वराज, वसुंधरा और चौहान के इस्तीफे पर अडी रही और सरकार अपनी बात पर। बाद में कांग्रेस के 25 सदस्यों को लोकसभा की कार्यवाही बाधित करने पर पांच दिन के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने विरोधस्वरुप पांच दिन के लिए सत्र के बॉयकॉट का ऐलान किया है। सत्र के नौ ही दिन बचे हैं। कांग्रेस की अनुपस्थिति में पांच दिन सरकार कुछ कामकाज निपटाने की कोशिश कर सकती है मगर वामपंथियों समेत अन्य विपक्षी दल संसद की कार्यवाही को बाधित कर सकते है। सरकार ने गुड्स एंड सर्विसिस बिल (जीएसटी) समेत 11 महत्वपूर्ण विधेयकों को मौजूदा सत्र में पारित करने के लिए सूचीबद्ध कर रखा है। जीएसटी बिल को अगर इस सत्र में पारित नही किया जाता हैे, तो गुडस एंड सर्विसिस टैक्स 2017 तक टल सकता है। इस बिल के पारित होने से पूरे देश में हर चीज पर एक समान कर लगाने की व्यवस्था है। बिल के पारित होने से केन्द्र और राज्यों के राजस्व में अच्छी-खासी वृद्धि की उम्मीद है। मूलतः, जीएसटी संवैधानिक संशोधन बिल है और इसे पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरुरत है। राज्यसभा में मोदी सरकार के पास स्पष्ट बहुमत तक नहीं है। लोकसभा इस बिल को एक बार मई, 2015 में पारित कर चुकी है। तब कांग्रेस ने विरोध में सदन का बहिष्कार किया था। सरकार संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर इस बिल को पारित करवा सकती है मगर इसके लिए भी दो-तिहाई बहुमत चाहिए। मौजूदा हालात में कांग्रेस और विपक्षी दलों के समर्थन के बगैर जीएसटी बिल पारित करवाना मुमकिन नहीं लग रहा है। कांग्रेस के मौजूदा सख्त स्टैंड से साफ है कि पार्टी सुषमा स्वराज, वसुधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे के बगैर संसद को चलने नहीं देगी। मोदी सरकार कांग्रेस की मांग पूरी करने से रही। इसका मतलब है कि कांग्रेस मौजूदा सत्र तो क्या अगले सत्रों को भी तब तक चलने नहीं देगी, जब तक शुष्मा सुषमा , वसुंधरा और चौहान पद नहीं छोड देते। कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। संसद नहीं चलने देने की यह रिवायत विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने ही शुरु की थी। अस्सी के दशक में बोफोर्स स्कैम को लेकर भाजपा ने 45 दिन तक संसद की कार्यवाही बाधित की थी। यह बात दीगर है कि कांग्रेस के पास तब संसद में प्रचंड बहुमत था, इसलिए ज्यादा कामकाज प्रभावित नहीं हुआ। टू -जी स्कैम और कोलगेट को लेकर भी लंबे समय तक संसद की कार्यवाही बाधित रही। तहलका कांड के अनावरण पर कांग्रेस ने संसद की कार्यवाही बाधित की थी। संक्षेप में संसद की कार्यवाही बाधित करना, देश के सियासी दलों के विरोध का प्रमुख हथियार बन चुका है। इससे देश को जो करोडों का नुकसान हो रहा है, उसकी किसी को कोई चिंता नहीं है। बहरहाल, महत्वपूर्ण सरकारी कामकाज निपटाने के लिए आचार संहिता बनाने की जरुरत है। जनता इसी काम के लिए सांसदों-विधायकों को चुन कर भेजती है।
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