स्टॉक मार्केट में भूचाल
चीन ने अपनी मुद्रा युवान का अवमूल्यन क्या किया, दुनिया भर की स्टॉक मार्केट में भूचाल सा आ गया है। युवान का अवमूल्यन किए जाने के बाद से शंघाई और शेन्जेन स्टॉक मार्केट का बुरा हाल है। सोमवार को शंघाई कंपोजिट सूकांक में 2007 के बाद की सबसे बडी 8.75 परसेन्ट की गिरावट दर्ज हुई। इसका असर लगभग सभी शेयर मार्केट्स में देखा गया। सोमवार को ही मुबंई स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स में 2009 के बाद की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई। सेंसेक्स 6 प्रतिश त की गिरावट से 1700 अंक लुढक गया। भारतीय शेयर बाजार की यह अब तक की तीसरी सबसे बडी गिरावट है। राष्ट्रीय सूचकांक निफ्टी में भी 5.92 प्रतिशत की गिरावट आई और इसके सभी 50 ट्रेडिड शेयर कम कीमत पर बेचे गए। एशियाई शेयर तीन साल के निम्न स्तर पर पहुंच गए हैं। इससे नब्बे के दशक की मंदी की आशंका नजर आ रही है। यूरोपियन स्टॉक्स (एफटीईयू-3) में तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। मलेशिया की मुद्रा रिंगित 17 साल और दक्षिण अफ्रीका की मुद्रा “रैंड“ 14 साल के निचले स्तर तक आ गई है। तुर्की की मुद्रा “लीरा“ अब तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। वैशविक औद्योगिक मांग ( ग्लोबल इंडस्ट्रियल डिमांड) का बेरोमीटर ”कूपर“ सोमवार को 2.5 प्रतिशत गिरा। भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 66.72 पर बंद हुआ। दो साल में डॉलर सोमवार को रुपये के मुकाबले सबसे महंगा बिका। 11 अगस्त को युवान के अवमूल्यन के बाद से रुपया डॉलर के मुकाबले 4 पर्सेंट सस्ता हो चुका है। रुपये के सस्ते होने से निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं। शुक्रवार को निवेशकों ने 2340 करोड रु की बिकवाली की। अप्रैल 2015 के बाद यह अब तक की यह सबसे बडी निकासी है। कमोडिटी मार्केट भीषण मंदी से पीडित हैं। तेल की कीमते लगातार गिरती जा रहीं हैं। सोमवार को यूएस क्रूड तीन प्रतिशत गिरकर 39.20 डालर बैलर और ब्रंट ऑयल 2.4 प्रतिशत गिरकर 44.40 प्रति बैलर बिक रहा था। तेल की कीमतें इस समय साढे छह साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं। दुनिया भर को इस बात की आशंका है कि चीन अभी युवान का और अवमूल्यन कर सकता है। इसी आशंका से दुनिया भर की मार्केट्स में अफरा-तफरी मची हुई है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था (अमेरिका नंबर वन) है और अगर यहां स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन किया जाता है, तो इससे दुनिया को यहीं संदेश जाता है कि चीन में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। चीन अभी तक निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था रही है मगर पिछले कुछ समय से वह कंज्यूमर स्पैंडिग एक्सपेंशन पर जोर दे रहा है। चीन अब इस नीति से भी आजिज आ चुका है। इसीलिए युवान का अवमूल्यन किया गया है। नोबल पुरुस्कार विजेता अग्रणी अर्थशास्त्री पॉल क्रूगमैन के अनुसार “ चीन ने अभी चेरी का पहला स्वाद चखा है“, आगे देखते हैं उसे चेरी कैसी लगती है“। चीन अब तक दुनिया का सुई से लेकर बडी-से-बडी कंज्यूमर गुड्स बेचने वाला सबसे बडा मुल्क है। दुनिया भर के बाजारों में “मेड इन चाइना“ की भरमार रहती है। जब तक चीन में लेबर, कच्चा माल और अन्य इनपुटस सस्ते थे,चीन को तुलनात्मक लाभ (कंपेरेटिव एडवांटेज) था, मगर उतरोत्तर वेजिज और लागत बढने से अब वह एडवांटेज नहीं रही। इसलिए चीन अपनी प्राथमिकताएं बदल रहा है। अमेरिका और यूरोप लंबे समय से ब्याज दरें बढाने का शोर मचा रहे हैं मगर ब्याज दरें अभी भी काफी सस्ती हैं। इससे वैष्विक मांग की कमी के संकेत मिलते हैं और डिफलेशन (ऋण की आपूर्ति और मुद्रा का संकट) का खतरा मंडरा रहा है। चीन अगर फिर अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता है, इससे “करेंसी वार“ छिड सकती है। भारत के लिए य्ह स्थिति खतरनाक हो सकती है। मोदी सरकार को समय रहते चेत जाना चाहिए।
चीन ने अपनी मुद्रा युवान का अवमूल्यन क्या किया, दुनिया भर की स्टॉक मार्केट में भूचाल सा आ गया है। युवान का अवमूल्यन किए जाने के बाद से शंघाई और शेन्जेन स्टॉक मार्केट का बुरा हाल है। सोमवार को शंघाई कंपोजिट सूकांक में 2007 के बाद की सबसे बडी 8.75 परसेन्ट की गिरावट दर्ज हुई। इसका असर लगभग सभी शेयर मार्केट्स में देखा गया। सोमवार को ही मुबंई स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स में 2009 के बाद की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई। सेंसेक्स 6 प्रतिश त की गिरावट से 1700 अंक लुढक गया। भारतीय शेयर बाजार की यह अब तक की तीसरी सबसे बडी गिरावट है। राष्ट्रीय सूचकांक निफ्टी में भी 5.92 प्रतिशत की गिरावट आई और इसके सभी 50 ट्रेडिड शेयर कम कीमत पर बेचे गए। एशियाई शेयर तीन साल के निम्न स्तर पर पहुंच गए हैं। इससे नब्बे के दशक की मंदी की आशंका नजर आ रही है। यूरोपियन स्टॉक्स (एफटीईयू-3) में तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। मलेशिया की मुद्रा रिंगित 17 साल और दक्षिण अफ्रीका की मुद्रा “रैंड“ 14 साल के निचले स्तर तक आ गई है। तुर्की की मुद्रा “लीरा“ अब तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। वैशविक औद्योगिक मांग ( ग्लोबल इंडस्ट्रियल डिमांड) का बेरोमीटर ”कूपर“ सोमवार को 2.5 प्रतिशत गिरा। भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 66.72 पर बंद हुआ। दो साल में डॉलर सोमवार को रुपये के मुकाबले सबसे महंगा बिका। 11 अगस्त को युवान के अवमूल्यन के बाद से रुपया डॉलर के मुकाबले 4 पर्सेंट सस्ता हो चुका है। रुपये के सस्ते होने से निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं। शुक्रवार को निवेशकों ने 2340 करोड रु की बिकवाली की। अप्रैल 2015 के बाद यह अब तक की यह सबसे बडी निकासी है। कमोडिटी मार्केट भीषण मंदी से पीडित हैं। तेल की कीमते लगातार गिरती जा रहीं हैं। सोमवार को यूएस क्रूड तीन प्रतिशत गिरकर 39.20 डालर बैलर और ब्रंट ऑयल 2.4 प्रतिशत गिरकर 44.40 प्रति बैलर बिक रहा था। तेल की कीमतें इस समय साढे छह साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं। दुनिया भर को इस बात की आशंका है कि चीन अभी युवान का और अवमूल्यन कर सकता है। इसी आशंका से दुनिया भर की मार्केट्स में अफरा-तफरी मची हुई है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था (अमेरिका नंबर वन) है और अगर यहां स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन किया जाता है, तो इससे दुनिया को यहीं संदेश जाता है कि चीन में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। चीन अभी तक निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था रही है मगर पिछले कुछ समय से वह कंज्यूमर स्पैंडिग एक्सपेंशन पर जोर दे रहा है। चीन अब इस नीति से भी आजिज आ चुका है। इसीलिए युवान का अवमूल्यन किया गया है। नोबल पुरुस्कार विजेता अग्रणी अर्थशास्त्री पॉल क्रूगमैन के अनुसार “ चीन ने अभी चेरी का पहला स्वाद चखा है“, आगे देखते हैं उसे चेरी कैसी लगती है“। चीन अब तक दुनिया का सुई से लेकर बडी-से-बडी कंज्यूमर गुड्स बेचने वाला सबसे बडा मुल्क है। दुनिया भर के बाजारों में “मेड इन चाइना“ की भरमार रहती है। जब तक चीन में लेबर, कच्चा माल और अन्य इनपुटस सस्ते थे,चीन को तुलनात्मक लाभ (कंपेरेटिव एडवांटेज) था, मगर उतरोत्तर वेजिज और लागत बढने से अब वह एडवांटेज नहीं रही। इसलिए चीन अपनी प्राथमिकताएं बदल रहा है। अमेरिका और यूरोप लंबे समय से ब्याज दरें बढाने का शोर मचा रहे हैं मगर ब्याज दरें अभी भी काफी सस्ती हैं। इससे वैष्विक मांग की कमी के संकेत मिलते हैं और डिफलेशन (ऋण की आपूर्ति और मुद्रा का संकट) का खतरा मंडरा रहा है। चीन अगर फिर अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता है, इससे “करेंसी वार“ छिड सकती है। भारत के लिए य्ह स्थिति खतरनाक हो सकती है। मोदी सरकार को समय रहते चेत जाना चाहिए।






