चुनावी मौसम में भी किसानों की आर्थिक सुधारने का श्रेय लेने के लिए टीवी चैनल्स पर “कुत्ते-बिल्ली” की तरह लडने वाले सियासी नेताओं को किसानों की बदहाली की चर्चा करना भी गवारा नहीं है। बस! बार-बार इस बात की डीगें मारते हैं,“ जो कुछ किया हमने किया, तुमने क्या किया“? आजादी के सात दशक बाद भी किसान कितना बदहाल है, हाल ही की दो घटनाओं से इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र का एक किसान पिछले सप्ताह नासिक की निफाद मंडी में प्याज की फसल 1.40 रु किलो बिकने पर इस कद्र हताश हुआ कि उसने अपनी फसल की कमाई प्रधानमंत्री मोदी को भेजी दी। इसके लिए किसान को मनी आर्डर करने के लिए 54 रु और खर्च करने पडे। चार माह की कडी मेहनत करके 750 किलो प्याज उगाया और यह फसल बिकी 1,064 में। इस कीमत पर तो खर्चा़ भी पूरा नहीं हुआ। और यह वही प्याज है जो कई बार आसमान छूती कीमतों से लोगों को रुला चुका है। बहरहाल, महाराष्ट्र के अहमदनगर किले के एक और किसान ने बैगन की फसल 20 पैसे किलो बिकने पर अपनी बची पूरी की पूरी फसल ही उखाड फेंक दी। बैगन की फसल उगाने के लिए इस किसान ने दो लाख खर्च किए थे मगर मिले मात्र 65,000। खेती पर गुजर-बसर करने वाला किसान करे तो क्या करे? इन हालात में अपना परिवार पालना भी मुमकिन नहीं है। अंतोगत्वा, हताशा में आत्महत्या करने पर विवश है। नेताओं को क्या पडी है? एक बार जनता का नुमाइंदा चुन लिए गए तो मौज ही मौज। आयकर मुक्त भारी-भरकम वेतन और भत्ते, शान-शौकत और पेंषन। किसान को तो फसल बीमा की सुविधा तक नहीं है। अगर है भी तो बीमा के नाम पर मजाक। कागजों पर बडे-बडे दावे किए जाते हैं। कांग्रेस दावा करती है कि पार्टी ने किसानों के लिए मोदी सरकार से भी ज्यादा किया है। मोदी सरकार का दावा है पिछले चार-पांच साल में किसानों की आय दोगुनी से ज्यादा हो गई है। फिर भी किसान बदहाल है। आखिर क्यों? नासिक के प्याज की पूरे देश में भारी मांग है। यहां तक कि खाडी देशों के लिए इसका निर्यात भी किया जाता है। फिर भी प्याज की कीमतों का क्रैश होना सरकार की नालायकी उजाकर करता है। प्याज के लिए सरकार न्यूनतम निर्यात कीमत तो तय करती है मगर समर्थन मूल्य नहीं। सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की, किसानों की भलाई से कहीं ज्यादा नेताओं को वोट बैंक की पडी रहती है। आप माने या न माने, इस देश का यही शाश्वत सच है।
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