गुरुवार, 30 अगस्त 2018

42 साल भी कम पड गए !

उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में  लोक नृत्य बेहद लोकप्रिय है और पौडी-गढवाल के कुछ इलाकों मे लखवाड लोक नृत्य का सिक्का है। ढोल और नगाडे की थाप पर महिलाएं समूह में कदम-से-कदम मिलाकर खूब थिरकती हैं। और अब 4000 करोड रु की लागत वाली लखवाड बहुउद्देषीय परियोजना को मिलकर बनाने के लिए छह राज्य ने कदम से कदम मिलाकर चलने का संकल्प लिया है। मंगलवार को केन्द्रीय भूतल परिवहन एवं जल संसाधन प्रबंधन मंत्री नीतिन गडकरी की उपस्थिति में  उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश , हरियाणा, हिमाचल प्रदेश , राजस्थान और दिल्ली ने इस आशय के करार को मूर्त रुप दिया। लखवाड परियोजना से 330 मेगावट बिजली का उत्पादन होगा। लखवाड के जलाश य के 330.66 मिलियन क्यूबिक  मीटर (एमसीएम)  पानी मेंसे  79  एमसीएम पानी को छह राज्यों के बीच बांटा जाएगा। इससे काफी हद तक इन राज्यो में गर्मियों में हो रही पेयजल की किल्लत दूर हो पाएगी। परियोजना को पूरा होने में लगभग पांच साल (58 माह) लग जाएंगे। लखवाड परियोजना के बिजली उत्पादन पर पूरा हक उत्तराखंड का ही होगा और कुल लागत का 1388 करोड रु का पॉवर कंपोनेंट भी यही राज्य वहन करेगा। लागत का बाकी 2578 करोड रु का 90 फीसदी (2320.41 करोड) केन्द्र वहन करेगा। इस कंपोनेंट (पेयजल और सिंचाई) मेंसे छह राज्यों को मिलकर मात्र दस फीसदी ही देना पडेगा। इस दस फीसदी मेंसे हरियाणा को सबसे ज्यादा 47.82 फीसदी, उत्तराखंड/ उत्तर प्रदेश  को 33.65, फीसदी, राजस्थान को  24.08 फीसदी, दिल्ली को 6.04 और हिमाचल प्रदेश  को मात्र 3.15 फीसदी देना होगा।  इस बहुउद्देषीय परियोजना ने कई उतार-चढाव देखे हैं। बयालीस साल पहले 1976 में  लखवाड परियोजना को योजना आयोग (अब नीति आयोग) की स्वीकृति मिल गई थी मगर पर्यावरण कलियरेंस लेते-लेते दस साल लग गए। अततः 1987 में काम षुरु हुआ और डैम बनाने का काम एक प्राइवेट कंपनी को दिया गया। डैम का निर्माण अभी  35 फीसदी ही पूरा हुआ था कि 1992 में निजी कंपनी ने फंडिंग नहीं मिलने के कारण काम बंद कर दिया। सोलह साल डैम का  मिर्माण  अधर  में लटका रहा। 2008 में केन्द्र ने इस परियोजना को नेशनल प्रोजेक्ट घोषित करते हुए इसकी  90 फीसदी फंडिग का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया।  2013 में फिर काम  शुरू  हुआ और एक साल बाद 2014 में दोबारा  पर्यावरण कलियरेंस भी मिल गई। अप्रैल, 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर इस परियोजना की 90 फीसदी सेंट्रल फंडिग भी जारी हो गई और इस साल जनवरी मे डैम और पॉवर हाउस बनाने के लिए निविदाएं मांगी गई थी। इस साल फिर से काम षुरु होने की उम्मीद है। परियोजना को 2016 तक पूरा हो जाना चाहिए था मगर अभी तक आधा काम भी नहीं हो पाया है। लखवाड परियोजना इस बात का प्रमाण है कि महत्वपूर्ण  परियोजनाओं में कैसे लेट-लतीफी आडे आती है और लागत कई गुना बढ जाती है।  1976 में एक हजार करोड रु से भी कम की परियोजना की लागत बयालीस साल में चार हजार करोड रु पहुंच गई है। सरकार के अपने आंकडे कहते हैं कि 13 साल का विलंब होने पर परियोजना की लागत 21.5 फीसदी तक बढ जाती है। अध्ययन से पता चला है कि देष के 331 इंफरास्ट्रक्चर  प्रोजेक्टस में विलंब के कारण देष को 1.72 खरब करोड रु का चूना लगा है। पिछले साल संसद को बताया गया था कि नवंबर 2017 तक देष की 302 महत्वपूर्ण  परियोजना में विलंब के कारण 1.45 लाख करोड रु का अतिरिक्त बोझ उठाना पडा है। विलंब के कारण 1,257 परियोजनाओं की  15,76,903,56  करोड लागत इनके पूरा होने तक बढकर 17,49,274,62 करोड रु हो गई थी। इस विलंब के लिए लालफीताषाही प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। विभिन्न सरकारी कलिरेंयस लेते-लेते कई साल लग जाते है और सरकार कहती है कि लालफीताषाही विलंब के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।