सचमुच, भारत अदभुत है। यहां अगर भोतिकवाद है, तो अध्यात्म भी फल-फूल रहा है। अगर आईटी क्रांति आई है, तो आस्था का समंदर भी फैला है। यहां मंदिर भी हैं, मस्जिद,चर्च और गुरुद्धारे भी। दुनिया में कहीं भी आपको ऐसा अलौकिक संगम नहीं मिलेगा। इसलिए, दुनिया की नामी-गिरामी हस्तियां भारत आने को उत्सुक रहती हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था ही नहीं, अध्यात्म शक्ति भी और ज्यादा निखरी है। रविवार को फेसबुक और सिलीकोन वैली में प्रधानमंत्री की विजिट के दौरान यह बात साफ साफ नजर आई। फेसबुक से सोशल मीडिया क्रांति लाने वाले इसके संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की यह बात भारत की अध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है कि भारत में मंदिरों से उन्हें आगे बढने का रास्ता मिला। फेसबुक मुख्यालय में मोदी की विजिट के समय उन्होंने यह बात कही। इस बार भी अमेरिका की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री सुर्खियों में है। मोदी संयुक्त राष्ट्र परिषद की बैठक मेॅ भाग लेने के लिए अमेरिका में है। अमेरिका की यात्रा कर रहे पोप इन दिनों मीडिया में छाए हुए है। यह स्वभाविक भी है। मगर पोप की यात्रा के बावजूद चीन, रुस और भारत भी सुर्खियों में हैं। तीनों दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं। इन्हें उपेक्षित नहीं किया जा सकता। रेंटिंग एजेंसियां, वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सभी भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति आषान्वित हैं। इस समय भारत आठ खरब (ट्रिलियन) डॉलर की अर्थव्यवस्था है। प्रधानमंत्री मोदी इसे 20 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं । इसी मकसद से रविवार को मोदी सिलीकॉन वैली गए और वहां स्थित दुनिया की टॉप कंपनियों को भारत आने का न्योता दिया। प्रधानमंत्री की यात्रा के फलस्वरुप एपल भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने और एपल को जन-धन योजना से जोडने के लिए तैयार हो गया है। माइक्रोसॉफ्ट पांच लाख ई-विलेज और गूगल 500 रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई सुविधाएं देेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यही सबसे बडी खासियत है। वे विदेशी यात्रा के दौरान कूटनीति की बजाय बिजनेस को ज्यादा तरजीह देते है। इस नीतिगत षिफ्ट से भारत को फायदा भी हुआ है। 16 माह में मोदी 27 देशों की यात्रा कर चुके हैं और इस दौरान उन्होंने साढे तीन लाख करोड डॉलर से ज्यादा का विदेशी निवेश भारत लाया है। सबसे ज्यादा निवेश 132 फीसदी अमेरिका से और 110 फीसदी फ्रांस से आया है। यह निवेश पूर्व प्रधानमंत्रियों की यात्रा के मुकाबले कहीं ज्यादा है। विदेशी निवेश के अलावा प्रधानमंत्री ने इस बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के लिए स्थाई सीट के लिए जमीन तैयार की है। वैसे समकालीन सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट का कोई बहुत ज्यादा सामरिक महत्व नही है। इसकी वजह है कि स्थाई सीट मिलने पर भारत को वीटो पॉवर नहीं मिलेगी। मगर भारतीय जनमानस के लिए यह सीट प्रतिष्टा का सवाल है। लंबे समय से हम चीन, अमेरिका के साथ सुरक्षा परिशद में बैठने के लिए लालायित है और पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर इस पर पानी फेरता रहा है। चीन भी अब सुरक्षा परिशद में भारत की स्थाई सीट की पात्रता पर नरम पडता जा रहा है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए कहा, “दुनिया के सबसे बडी लोकतांत्रिक ताकत को उपेक्षित नहीं किया जा सकता“। तथापि कुछ विशेषज्ञों का आकलन है कि प्रधानमंत्री ने अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों बार डिजिटल कंपनियों पर ही फोक्स किया है। डिजिटल इंडिया मोदी का सपना है। डिजिटल कंपनियां ज्यादा निवेश नहीं करती और न ही अधिक रोजगार सृजित करती हैं। ऐसी कंपनियां सिर्फ सुविधाएं बढाती हैं जिससे उन्हें ज्यादा फायदा होता है। बहरहाल, अमेरिका में इस बार भी मोदी ने भारत की साख बढाई है।
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