शनिवार, 19 सितंबर 2015

Global Demand Driven US Keeps Rate Unchanged

                                               और  अमेरिकी को छींक आ गई

अमेरिकी सैंट्रल बैंक (फेडेरल रिजर्व) ने ब्याज दरों को यथावत रखकर उभरती अर्थ व्य्वस्थाओं को राहत प्रदान की है। पिछले कई महीनों से अमेरिका के सेंट्रल बैंक द्वारा ब्याज दरें बढाने की अटकलें लगाई जा रही थी। और अतंतः वीरवार को फेडेरल रिजर्व ने उम्मीदों के विपरीत ब्याज दरें बढाने की बजाए यथावत रखीं। अमेरिका का आकलन है कि इस समय वैश्विक  अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। हाल ही में अमेरिकी  शेयर्स  में लगातार गिरावट  आई है और डॉलर महंगा हुआ है। तेल की कीमतें लगातार गिर रही हैं। इससे घरेलू फाइनेशियल मार्केट संकुचित होती नजर आ रही है। अमेरिका, चीन के स्लोडाउन से भी सहमा हुआ है। अमेरिका के बाद चीन दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और अगर दोंनों मंदी के दौर से गुजरें, तो पूरी दुनिया पर इसका प्रतिकूल असर पड सकता है। फिलहाल, अमेरिका मंदी से उभर चुका है। अमेरिका में मुद्रा स्फीति दो फीसदी के स्तर से भी कम है और 2018 तक इसके इसी स्तर पर रहने की उम्मीद है। बेरोजगारी भी न्यूनतम 4. 8 फीसदी के स्तर पर है। दो दिन पहले जारी आंकडे बताते हैं कि इस सप्ताह अमेरिका में बेरोजगारी भत्ते लेने वाले आवेदकों में खासी कमी आई है। इससे पता चलता है कि अमेरिका में इस समय बेरोजगारी न्यूनतम स्तर पर है।  इस स्थिति के  दृष्टिगत , अमेरिका ने इस समय ब्याज दरों को बढाना उचित नहीँ समझा। 2008 से अमेरिका में ब्याज दरें शून्य  के आसपास ( 0.25 फीसदी ) हैं। शून्य  से और नीचे जाने की कोई गुंजाइश  नहीं होती है।  एमरजिंग मार्केट्स को लगता था, अमेरिका ब्याज दरें बढाएगा और इससे उन पर खासा असर पडेगा। कहते हैं अमेरिका को अगर छींक भी आ जाए तो पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता है। शुक्रवार को यही हुआ।  एमरजिंग मार्केट्स में उछाल देखा गया जबकि विकसित मार्केट्स में मंदी का दौर रहा। एशिया-पेसेफिक  शेयर्स  को  दर्शाने  वाला एमएससीआई ब्रॉडेस्ट इंडेक्स एक फीसदी उछाल के साथ चार सप्ताह के उच्चतर स्तर पर पहुंच गया। जापानी  शेयर्स  के इंडेक्स निक्की में जरुर गिरावट दर्ज  हुई। चीन और भारत दोनों के शेयर  बाजार में तेजी का दौर रहा। दरअसल, अमेरिका में ब्याज दरें यथावत रहने से भारत और चीन जैसी एमरजिंग मार्केट्स को सबसे ज्यादा फायदा होता है। अमेरिका और यूरोप में इस समय ब्याज दरें न्यूनतम स्तर पर हैं और वहां बान्डस से रिटर्न  काफी कम है। इसके विपरीत भारत, चीन और अन्य एमरजिंग मार्केटस में ब्याज दरें काफी ऊंची है और बान्डस से अच्छी खासी  रिटर्न आती है। अमेरिका अगर ब्याज दरें बढाता है तो यूरोप सेंट्रल बैंक को भी ऐसा ही करना पड सकता है। जाहिर है इस स्थिति में निवेशक एमरजिंग मार्केट्स को छोडकर अमेरिका और यूरोप जा सकते हैं। यूरोप की स्थिति काफी दयनीय है। ब्याज दरें न्यूनतम रहने के बावजूद ग्रोथ की रफ्तार गति नहीं पकड पा रही है। बेरोजगारी लगातार बढ रही है। शरणार्थियों ने अलग से यूरोप पर धावा बोल रखा है। बहरहाल, अमेरिका और यूरोप में  शून्य के आसपास ब्याज दरें रहने से  एमरजिंग मार्केटस को फायदा हो सकता है। ताजा हालत में अमेरिका में ब्याज दरें वैश्विक  हालात, वैश्विक  मांग और वैश्विक  को सामने रख कर तय किया जा रहा है। इसमें चीन और भारत काफी अहम हो सकते हैं।  भारत में इस समय कर्ज काफी महंगा है। अमेरिका में ब्याज दरें नहीं बढने से भारतीय रिजर्व बैंक पर कर्ज सस्ता करने के लिए दबाव बढ सकता है। इस माह के अंत में आरबीआई को अपनी मौद्रिक नीति का ऐलान करना है। अगले माह त्योहारी सीजन भी शुरु होने वाला है। इससे मांग के उठने की उम्मीद है और अगर कर्ज सस्ता किया जाता है तो अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड सकती है।