प्रलंयकारी भूकंप की आषंका ?
सोमवार को अफगानिस्तान में आया भूकंप क्या हिमालय क्षेत्रों में संभावित किसी प्रलंयकारी भूकंप की चेतावनी दे रहा है? इस भूकंप का केन्द्र (ऐपी सेंटर) भी अफगानिस्तान का हिन्दु-कुष क्षेत्र था। भारत के भू-विज्ञानियों ने इसकी तीव्रता रिचटर स्केल पर 6.2 अथवा 4.3 मीटर आंकी है जबकि यूएस जिओजिक्ल सर्वे के अनुसार इसकी तीव्रता 5.6 थी। इस भूंकप से अभी तक जानमाल को किसी तरह की क्षति पहुंचने की कोई सूचना नहीं है । उत्तर भारत और नेपाल समेत दक्षिण एषिया के कई क्षेत्रों में इस भूकंप के झटके महसूस किए गए। सोमवार के भूकंप की तीखी तीव्रता के बावजूद इसकी गहराई (हाइपो सेंटर) जमीन से काफी नोचे (983 किमी नीचे) थी, इसलिए पीडित क्षेत्र तबाही से बच गए। 25 अप्रैल, 2015 में नेपाल में आए भूकंप की तीव्रता रिचटर स्केल पर 7.8 अथवा 8.1 मीटर आंकी गई थी और इसका हाइापो सेंटर 15 किमी नीचे था। भू-विज्ञानियों के अनुसार भूकंप से जानमाल का कितना नुकसान हो सकता है, यह इसकी तीव्रता (इटेंसिटी) और हाइपोसेंटर पर निर्भर करता है। सोमवार को आए भूकंप का हाइपोसेंटर काफी गहरा था, इसलिए नुकसान नहीं हुआ जबकि नेपाल के भूकंप का हाइपोसेंटर ज्यादा गहरा नहीं था और इसकी तीव्रता अधिक थी, इसलिए वहां ज्यादा नुकसान हुआ। नेपाल में 7.8 की तीव्रता के भूकंप ने 9000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और लाखों परिवारों को एक झटके में बेघर कर दिया। सोमवार के भूकंप में कोई नुकसान नहीं हुआ। भूकंप सामान्य भूगर्भीय प्रकिया है और इसे रोका नहीं जा सकता। दुनिया में हर रोज औसतन 55 भूकंप आते हैं। भूगर्भ में जमा एनर्जी के रिलीज होने पर भूकंप आते हैं। इसलिए जैसे ही भूगर्भ में जरुरत से ज्यादा एनर्जी (स्ट्रैस) जमा होती है, यह भूकंप की षक्ल में फूट कर बाहर आ जाती है। और अगर जमा एनर्जी पूरी तरह से रिलीज नहीं होती तो फिर से झटके (आफ्टरषॉक) महसूस किए जाते हैं। नेपाल में ऐसा ही हुआ। 25 अप्रैल के भूंकप के बाद 12 मई 2015 को पुनः 7.3 की तीव्रता का भूकंप आया और इस बार 200 लोगों को लील गया, 2500 से ज्यादा घायल हो गए। नेपाल में अप्रैल, 2015 का भूकंप 1935 के हिमालय भूकंप के बाद दूसरा बडा झटका था। भू-वैज्ञानियों का ही मानना है कि सौ साल के भीतर प्रलंयकारी भूकंप आता ही है। भू-वैज्ञानियों का यह भी आकलन है कि छोटे-मोटे भूकंप भूगर्भ में जमा स्ट्रैस को रिलीज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिचटर स्केल पर 8 और इससे ज्यादा की तीव्रता का भूकंप ही भूगर्भीय स्ट्रेस को मुक्त कर सकता है। इस तथ्य के दृश्टिगत नेेपाल के भूकंप को भूगर्भीय स्ट्रेस दूर करने के लिए अप्रर्याप्त माना जा रहा है। यानी हिमालय क्षेत्रों में अभी प्रलंयकारी भूकंप आना बाकी है। विख्यात अमेरिकी भू-वैज्ञानिक रोजर बिलहाम का आकलन है कि हिमालय में 9 की तीव्रता का भूकंप आना अभी बाकी है। बिलहाम ने ही दो दषक पहले हिमालय क्षेत्र में किसी बडे भूकंप आने की भविश्यवाणी की थी। उनका आकलन है कि नेपाल के पष्चिम की दिषा में कुमाऊं-गढवाल क्षेत्र भूकप की दृश्टि से काफी संवेदनषील है और इस क्षेत्र में प्रलंयकारी भूकंप आ सकता है। बिलहाम ने नेपाल के काठमांडू से उत्तराखंड के देहरादून तक “सिस्मिक गैप“ को चिन्हित किया है। इस क्षेत्र में पिछले 200 वर्शों में कोई बडा भूकंप नहीं आया है। कनास विष्वविधालय के भू-विज्ञानी माइक टेलर का भी यही आकलन है कि नेपाल और भारत के हिमालय क्षेत्रों में एक बहुत बडी सिस्मिक फाल्ट बैल्ट है जो किसी प्रलंयकारी भूकंप की ओर इषारा करती है। बहरहाल, इन सब चेतावनी के बावजूद हम चेते नहीं है और पहाडों की चीर-फाड करके और ऊंची इमारतें बनाकर तबाही को न्योता दे रहे हैं।
सोमवार को अफगानिस्तान में आया भूकंप क्या हिमालय क्षेत्रों में संभावित किसी प्रलंयकारी भूकंप की चेतावनी दे रहा है? इस भूकंप का केन्द्र (ऐपी सेंटर) भी अफगानिस्तान का हिन्दु-कुष क्षेत्र था। भारत के भू-विज्ञानियों ने इसकी तीव्रता रिचटर स्केल पर 6.2 अथवा 4.3 मीटर आंकी है जबकि यूएस जिओजिक्ल सर्वे के अनुसार इसकी तीव्रता 5.6 थी। इस भूंकप से अभी तक जानमाल को किसी तरह की क्षति पहुंचने की कोई सूचना नहीं है । उत्तर भारत और नेपाल समेत दक्षिण एषिया के कई क्षेत्रों में इस भूकंप के झटके महसूस किए गए। सोमवार के भूकंप की तीखी तीव्रता के बावजूद इसकी गहराई (हाइपो सेंटर) जमीन से काफी नोचे (983 किमी नीचे) थी, इसलिए पीडित क्षेत्र तबाही से बच गए। 25 अप्रैल, 2015 में नेपाल में आए भूकंप की तीव्रता रिचटर स्केल पर 7.8 अथवा 8.1 मीटर आंकी गई थी और इसका हाइापो सेंटर 15 किमी नीचे था। भू-विज्ञानियों के अनुसार भूकंप से जानमाल का कितना नुकसान हो सकता है, यह इसकी तीव्रता (इटेंसिटी) और हाइपोसेंटर पर निर्भर करता है। सोमवार को आए भूकंप का हाइपोसेंटर काफी गहरा था, इसलिए नुकसान नहीं हुआ जबकि नेपाल के भूकंप का हाइपोसेंटर ज्यादा गहरा नहीं था और इसकी तीव्रता अधिक थी, इसलिए वहां ज्यादा नुकसान हुआ। नेपाल में 7.8 की तीव्रता के भूकंप ने 9000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और लाखों परिवारों को एक झटके में बेघर कर दिया। सोमवार के भूकंप में कोई नुकसान नहीं हुआ। भूकंप सामान्य भूगर्भीय प्रकिया है और इसे रोका नहीं जा सकता। दुनिया में हर रोज औसतन 55 भूकंप आते हैं। भूगर्भ में जमा एनर्जी के रिलीज होने पर भूकंप आते हैं। इसलिए जैसे ही भूगर्भ में जरुरत से ज्यादा एनर्जी (स्ट्रैस) जमा होती है, यह भूकंप की षक्ल में फूट कर बाहर आ जाती है। और अगर जमा एनर्जी पूरी तरह से रिलीज नहीं होती तो फिर से झटके (आफ्टरषॉक) महसूस किए जाते हैं। नेपाल में ऐसा ही हुआ। 25 अप्रैल के भूंकप के बाद 12 मई 2015 को पुनः 7.3 की तीव्रता का भूकंप आया और इस बार 200 लोगों को लील गया, 2500 से ज्यादा घायल हो गए। नेपाल में अप्रैल, 2015 का भूकंप 1935 के हिमालय भूकंप के बाद दूसरा बडा झटका था। भू-वैज्ञानियों का ही मानना है कि सौ साल के भीतर प्रलंयकारी भूकंप आता ही है। भू-वैज्ञानियों का यह भी आकलन है कि छोटे-मोटे भूकंप भूगर्भ में जमा स्ट्रैस को रिलीज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिचटर स्केल पर 8 और इससे ज्यादा की तीव्रता का भूकंप ही भूगर्भीय स्ट्रेस को मुक्त कर सकता है। इस तथ्य के दृश्टिगत नेेपाल के भूकंप को भूगर्भीय स्ट्रेस दूर करने के लिए अप्रर्याप्त माना जा रहा है। यानी हिमालय क्षेत्रों में अभी प्रलंयकारी भूकंप आना बाकी है। विख्यात अमेरिकी भू-वैज्ञानिक रोजर बिलहाम का आकलन है कि हिमालय में 9 की तीव्रता का भूकंप आना अभी बाकी है। बिलहाम ने ही दो दषक पहले हिमालय क्षेत्र में किसी बडे भूकंप आने की भविश्यवाणी की थी। उनका आकलन है कि नेपाल के पष्चिम की दिषा में कुमाऊं-गढवाल क्षेत्र भूकप की दृश्टि से काफी संवेदनषील है और इस क्षेत्र में प्रलंयकारी भूकंप आ सकता है। बिलहाम ने नेपाल के काठमांडू से उत्तराखंड के देहरादून तक “सिस्मिक गैप“ को चिन्हित किया है। इस क्षेत्र में पिछले 200 वर्शों में कोई बडा भूकंप नहीं आया है। कनास विष्वविधालय के भू-विज्ञानी माइक टेलर का भी यही आकलन है कि नेपाल और भारत के हिमालय क्षेत्रों में एक बहुत बडी सिस्मिक फाल्ट बैल्ट है जो किसी प्रलंयकारी भूकंप की ओर इषारा करती है। बहरहाल, इन सब चेतावनी के बावजूद हम चेते नहीं है और पहाडों की चीर-फाड करके और ऊंची इमारतें बनाकर तबाही को न्योता दे रहे हैं।






