शनिवार, 25 जुलाई 2015

The Death Traps on Indian Roads

                                              मौत की सडकें

हिमाचल प्रदेष में कुल्लू जिले के धार्मिक स्थल मणिकर्ण के निकट वीरवार को हुई दुखद सडक दुर्घटना ने फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि प्रोन्नत टकनॉलॉजी और समृद्ध विज्ञान के बावजूद देष में सडक सफर आज भी सुरक्षित नहीं है। इस हादसे में 35 लोग मारे गए। बस में सवार पंजाब के यात्री हिमाचल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मणिकर्ण जा रहे थे। हिमाचल प्रदेष में सडकों को जीवन रेखा माना जाता है और आम आदमी के लिए परिवहन का यही एकमात्र साधन है। इसीलिए, इस पहाडी राज्य में अगर सडक का सफर सुरक्षित नहीं है, तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। हिमाचल में औसतन हर साल 3000 सडक हादसे होते हैं ओर इनमे एक हजार से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। राज्य विधानसभा में पेष आंकडों के अनुसार 2011 में 3099 सडक दुर्घटनाओं में 1072 लोग मारे गए थे और 2012 में 3300 सडक हादसों में 1200 के करीब लोग मारे गए थे। 2013 और 14 में यद्यपि सडक दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में थोडी कमी आई है मगर मौत का यह खेल बदस्तूर जारी है। इस बात में दो राय नहीं है कि राज्य में वाहनों की ंसंख्या में अप्रत्याषित इजाफा हुआ है मगर उसी अनुपात में सडकों के हालात नहीं सुधरे हैं। इस समय  राज्य पथ परिवहन (एचआरटीसी) की चार हजार बसों समेत प्रदेष में दस हजार के करीब यात्री बसें सडकों पर दौडती हैं और लगभग एक हजार बसें बाहर से आतीं है। एचआरटीसी की 80 प्रतिषत से भी ज्यादा बसें खस्ता हाल हैं। नेषनल क्राइम रिपोर्ट  ब्यूरो की 2013 की रिपोर्ट  के अनुसार सडक हादसों में  प्रति हजार मृतकों के मामले में हिमाचल देष तीसरे स्थान पर है। इससे पता चलता है कि इस पहाडी प्रदेष में सडक का सफर कितना असुरक्षित है। तंग, घुमावदार सडकें और खस्ता हाल यात्री बसों के अलवा तेज रफ्तार और चालक की लापरवाही सडक हादसों के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। हर बार सडक हादसा होने के बाद राज्य सरकार रोड सेफ्टी पर पुख्ता नीति बनाने की घोशणा करती है मगर आज तक इस मामले में कोई पहल नहीं हुई है। बहरहाल, सडक दुर्घतटनाओं के मामले में पूरे देष की स्थिति उतरोत्तर बद से बदतर होती जा रहा है। आंकडे इस बात के गवाह हैं। 2014 में देष की सडकों पर मानों मौत सवार थी। हर घंटे औसतन 16 लोग सडक हादसों के षिकार होते रहे और कुल मिलाकर 1.41 लाख लोग हादसों में मारे गए। यह संख्या 2013 से तीन प्रतिषत ज्यादा थी। केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट  ने भी माना है कि भारत में हर रोज 377 लोग सडक हादसों में मरते हैं। दुनिया में यह संख्या सबसे ज्यादा है। सरकार हर साल सडक हादसों के आंकडे जारी कर अपनी चिंता व्यक्त करके चुप्पी साध लेती है। इस मामले में भारत चीन से सबक ले सकता है। चीन की आबादी भी हमसे ज्यादा है और वाहनों की संख्या भी मगर अब वहां सडक हादसे भारत के मुकाबले काफी कम है। 2005 में चीन में सडक हादसों में जहां 98,738 लोग मारे गए थे, 2010 आते-आते यह संख्या 65,225 ही रह गई थी। इसकी तुलना में भारत में 2005 में जहां 94,965 लोग सडक हादसों में मारे गए, 2010 में मरने वालों की संख्या 1,34,513 यानी चीन से दोगुना हो गई थी। सुखद स्थिति यह है कि  2011 से 2013 के दौरान भारत में सडक हादसों में मरने वाले की संख्या में 3 प्रतिषत की गिरावट आई थी । 78 प्रतिषत सडक हादसे चालक की लापरवाही से होते हैं। पूरी स्थिति का आकलन करने पर निश्कर्श  यह है कि जितनी जल्दी हो सके रोड सेफ्टी कानून को लागू किया जाना चाहिए।