आर्थिक सुधारों की धीमी गति
देष में आर्थिक सुधारों की धीमी गति और तरह-तरह के नीतिगत अवरोधकों से आजिज निवेषकों का मोदी सरकार से भी भरोसा टूट रहा है। मोदी सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ हुए करीब सवा साल होने जा रहा है मगर अभी तक आर्थिक सुधारों की रफ्तार लगभग वैसी ही है जैसी मनमोहन सिंह सरकार के समय थी। देष के उधोग और वाणिज्य जगत की अग्रणी संस्था एसोचैम और बिजकॉन के सर्वे में खुलासा हुआ है कि आार्थिक सुधारों पर तेजी से अमल नहीं होने के कारण उधोग और कॉर्पोरेट जगत का धैर्य जबाव दे रहा है। वैसे उधोग जगत यह बात भी मानता है कि मोदी सरकार अवरोधकों को हटाने और आर्थिक सुधार लागू करने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है मगर सकारात्मक परिणाम नहीं आने से कॉर्पोरेट जगत निराष है। कहावत है “बातों से भूखे का पेट नहीं भरता“। यही बात निवेषकों पर भी लागू होती है। मार्च में जहां 83 प्रतिषत कंपनियां मोदी सरकार के प्रयासों के प्रति सकारात्मक सोच रखती थीं, वहीं जून आते-आते यह संख्या 53 प्रतिषत रह गई है। 51 प्रतिषत कंपनियां का मानती है कि अप्रैल-जून तिमाही के दौरान रोजगार सृजन में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया है। आष्वासनों और केवल मात्र प्रयासों से देष में निवेष आने से रहा । और अगर निवेष नहीं आया तो लोगों को रोजगार भी नहीं मिलेगा। रोजगार नहीं होगा तो आय भी नहीं होगी। इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड सकता है। एसोचैम, बिजकॉम के सर्वे से पहले इसी माह अंतरराश्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी के सर्वे में भी इसी तरह का परिदृष्य पेष किया गया था। देष की आर्थिक राजधानी मुंबई में मई माह के दौरान कराए गए मूडी सर्वे का निश्कर्श था कि “नीति जडता का खतरा“ (पॉलिसी पैरालिस) और आर्थिक सुधारों को गति नहीं मिलना भारत में निवेष का न आने का सबसे बडा कारण है। सर्वे के मुताबिक निवेषकों का मानना है कि प्रोजेक्ट अप्रूवल में वही परंपरागत देरी हो रही है। आसानी से कर्जा नहीं मिल रहा है और अगर मिलता है तो मंहगा होता है। इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर का अभी भी बुरा हाल है और निवेषकों के लिए कोई सुविधाएं नहीं है। इन हालात में निवेषक भारत में अपना पैसा क्योंकर लगाएगा? विष्व बैंक और अंतरराश्ट्रीय मुद्रा कोश भी इसी तरह की तस्वीर पेष कर चुके हैं। इन अध्ययनों-सर्वेक्षणों का निश्कर्श यह है कि मोदी सरकार के चौदह माह बाद भी देष के हालात में कोई बहुत बडा बदलाव नहीं आया है और षुरु में जो हाइप बनाया गया था, अब वह भी नदारद है। भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान कि “अच्छे दिन लाने में 25 वर्श लग सकते हैं“ को भी नकारात्मक माना जा रहा है। सरकार अगर जनता से किए गए वायदों से मुकर सकती है, तो अन्य से भी पीछे हट सकती है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि मोदी सरकार के 14 माह में देष और अर्थव्यवस्था में कोई उल्लेखनीत बदलाव नहीं आया है हालांकि अर्थव्यवस्था संप्रग सरकार की मरणासन्न जैसी स्थिति से उभर चुकी है। राहत की बात यह है कि तेल की कीमतें और सोना भी पांच साल के निम्न स्तर पर। इससे मोदी सरकार को कुछ राहत मिल सकती है। मॉनसून अगर जमकर बरसती है तो अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। रेटिंग एजेंसी मूडी के सर्वे में भी भारतीय अर्थव्यवस्था के सुनहरे दिनों के लौटने की उम्मीद जाहिर की गई है। कुछ सुदृढ फंडामेंटलस के कारण 2015-16 में अपेक्षित 7.5 प्रतिषत विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है बषर्ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आषातीत सुधार बना रहे।
देष में आर्थिक सुधारों की धीमी गति और तरह-तरह के नीतिगत अवरोधकों से आजिज निवेषकों का मोदी सरकार से भी भरोसा टूट रहा है। मोदी सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ हुए करीब सवा साल होने जा रहा है मगर अभी तक आर्थिक सुधारों की रफ्तार लगभग वैसी ही है जैसी मनमोहन सिंह सरकार के समय थी। देष के उधोग और वाणिज्य जगत की अग्रणी संस्था एसोचैम और बिजकॉन के सर्वे में खुलासा हुआ है कि आार्थिक सुधारों पर तेजी से अमल नहीं होने के कारण उधोग और कॉर्पोरेट जगत का धैर्य जबाव दे रहा है। वैसे उधोग जगत यह बात भी मानता है कि मोदी सरकार अवरोधकों को हटाने और आर्थिक सुधार लागू करने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है मगर सकारात्मक परिणाम नहीं आने से कॉर्पोरेट जगत निराष है। कहावत है “बातों से भूखे का पेट नहीं भरता“। यही बात निवेषकों पर भी लागू होती है। मार्च में जहां 83 प्रतिषत कंपनियां मोदी सरकार के प्रयासों के प्रति सकारात्मक सोच रखती थीं, वहीं जून आते-आते यह संख्या 53 प्रतिषत रह गई है। 51 प्रतिषत कंपनियां का मानती है कि अप्रैल-जून तिमाही के दौरान रोजगार सृजन में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया है। आष्वासनों और केवल मात्र प्रयासों से देष में निवेष आने से रहा । और अगर निवेष नहीं आया तो लोगों को रोजगार भी नहीं मिलेगा। रोजगार नहीं होगा तो आय भी नहीं होगी। इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड सकता है। एसोचैम, बिजकॉम के सर्वे से पहले इसी माह अंतरराश्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी के सर्वे में भी इसी तरह का परिदृष्य पेष किया गया था। देष की आर्थिक राजधानी मुंबई में मई माह के दौरान कराए गए मूडी सर्वे का निश्कर्श था कि “नीति जडता का खतरा“ (पॉलिसी पैरालिस) और आर्थिक सुधारों को गति नहीं मिलना भारत में निवेष का न आने का सबसे बडा कारण है। सर्वे के मुताबिक निवेषकों का मानना है कि प्रोजेक्ट अप्रूवल में वही परंपरागत देरी हो रही है। आसानी से कर्जा नहीं मिल रहा है और अगर मिलता है तो मंहगा होता है। इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर का अभी भी बुरा हाल है और निवेषकों के लिए कोई सुविधाएं नहीं है। इन हालात में निवेषक भारत में अपना पैसा क्योंकर लगाएगा? विष्व बैंक और अंतरराश्ट्रीय मुद्रा कोश भी इसी तरह की तस्वीर पेष कर चुके हैं। इन अध्ययनों-सर्वेक्षणों का निश्कर्श यह है कि मोदी सरकार के चौदह माह बाद भी देष के हालात में कोई बहुत बडा बदलाव नहीं आया है और षुरु में जो हाइप बनाया गया था, अब वह भी नदारद है। भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान कि “अच्छे दिन लाने में 25 वर्श लग सकते हैं“ को भी नकारात्मक माना जा रहा है। सरकार अगर जनता से किए गए वायदों से मुकर सकती है, तो अन्य से भी पीछे हट सकती है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि मोदी सरकार के 14 माह में देष और अर्थव्यवस्था में कोई उल्लेखनीत बदलाव नहीं आया है हालांकि अर्थव्यवस्था संप्रग सरकार की मरणासन्न जैसी स्थिति से उभर चुकी है। राहत की बात यह है कि तेल की कीमतें और सोना भी पांच साल के निम्न स्तर पर। इससे मोदी सरकार को कुछ राहत मिल सकती है। मॉनसून अगर जमकर बरसती है तो अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। रेटिंग एजेंसी मूडी के सर्वे में भी भारतीय अर्थव्यवस्था के सुनहरे दिनों के लौटने की उम्मीद जाहिर की गई है। कुछ सुदृढ फंडामेंटलस के कारण 2015-16 में अपेक्षित 7.5 प्रतिषत विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है बषर्ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आषातीत सुधार बना रहे।






